दाम्पत्य जीवन में दरार क्यों आती है? किसी और नहीं आपके हाथ में है इसे मजबूत बनाना

विवाह केवल एक सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि विश्वास, प्रेम और समर्पण का पवित्र संगम है। पति-पत्नी का रिश्ता जीवन के हर उतार-चढ़ाव में एक-दूसरे का साथ निभाने की सच्ची परीक्षा है। आज के बदलते समय में इस रिश्ते को समझना और संभालना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। गंगाराम अस्पताल के बेहोशी के […]

विवाह केवल एक सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि विश्वास, प्रेम और समर्पण का पवित्र संगम है। पति-पत्नी का रिश्ता जीवन के हर उतार-चढ़ाव में एक-दूसरे का साथ निभाने की सच्ची परीक्षा है। आज के बदलते समय में इस रिश्ते को समझना और संभालना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। गंगाराम अस्पताल के बेहोशी के विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ. भुवन चंद्र पाण्डेय का पढ़िए

संतुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च। यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम्॥ (मनुस्मृतिः)

जिस परिवार में पति अपनी पत्नी से और पत्नी अपने पति से सदा संतुष्ट रहती है, उस कुल (परिवार) में कल्याण (सुख, समृद्धि और सौभाग्य) निश्चित रूप से स्थायी रूप से निवास करता है।

अग्नि, जो सब कुछ अपने पवित्र ताप में भस्मिभूत करके पवित्र कर देती है, को साक्षी मानकर लिए गए सात फेरे, जो सात चक्रों के लिए भी हैं और साथ ही साथ सात पवित्र वचनों को निभाने के कारण भी हैं, स्त्री और पुरुष, जो विवाह पूर्व तक एक-दूसरे के अंतर्मन से अनभिज्ञ थे, उन दोनों को एक अद्भुत, विशेष व पवित्र बंधन में बाँध देते हैं। पति-पत्नी का सम्बन्ध एक अलग ही प्रकार का होता है, इसमें सफलता का एक ही मुख्य कारण है—एक-दूसरे के प्रति पूर्ण सहयोग और समर्पण। इसमें दिए गए सात वचनों की गंभीरता व पवित्रता का मान रखकर अगर उचित पति धर्म (सुरक्षा, पैसा, देख-रेख, मान-सम्मान) निभाया जाए और पत्नी (परिवार को बढ़ाना, प्रेम, समर्पण, भोजन की व्यवस्था आदि करना) भी अपने धर्म का निर्वाह करे तो वैवाहिक जीवन की यात्रा, जो कि सुख-दुःख के अगोचर तंतुओं से ओत-प्रोत है, कहीं उलझती और कहीं सुलझती यह यात्रा बिना किसी परेशानी के चलेगी; अगर कोई कष्ट आएगा भी, तो आपसी सामंजस्य व समझ-बूझ से उसके पार निकल जाएगी।

पैसा और पद तो आनी-जानी चीजें हैं, पर बिना डगमगाए विश्वास और समर्पण का अडिग रूप से बने रहना उस रिश्ते को और अटूट बना देता है। हम लोगों को हमारे विधि-विधानों में बड़ी बारीकी से देखना चाहिए कि युगल-जीवन कैसे अच्छा हो सकता है। बहुत-सी बातें तो साधारण-सी प्रतीत होती हैं, पर गहरा असर डालती हैं; उदाहरण के लिए—कुछ गुणों का एक-सा होना, आयु का अंतर, घर की परिस्थितियाँ, शिक्षा का स्तर, कुछ विशेष गुणों का एक-सा न होना आदि। शायद यही कारण है कि विवाह के इन अलौकिक रस्मों व रीति-रिवाजों के पूर्ण होने पर उन्हें विष्णु-लक्ष्मी जी समान मानकर उनकी आरती की जाती है; उसके बाद वे पूरे जीवन-पर्यंत ही नहीं, अपितु एक-दूसरे के प्रति पूर्ण समर्पित तन-मन-धन व आत्मिकता से जन्मों-जन्मान्तरों के बंधन में बंध जाते हैं, यह एक गहन व विलक्षण सोच है।

जन्मों-जन्मान्तरों के इस परम-पुनीत सम्बन्ध में उथलापन आजकल उनके पहनावे, बोलचाल, दिखावे की मुस्कान व कार्य-कलापों में साफ-साफ दिख जाता है। जीवन के सुखमय कालखंड में तो अनजान व्यक्ति भी मुस्कुराकर आपके साथ हो मुफ्त का भोजन खा लेता है, पर असल परीक्षा तो किसी कठिन परिस्थिति में या अवसाद के समय होती है। ऐसे समय में साथ देने वाला ही सच्चा मित्र है, चाहे वह कोई भी हो। जब जीवन पर बन आती है, तो पति-पत्नी ही सबसे ज्यादा समर्पित होकर एक-दूसरे के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले दिखते हैं।

विवाह में वर-वधू निर्धारित संस्कारों व विधि-विधानों के पश्चात एक-दूसरे से पति-पत्नी के पावन व समर्पित सम्बन्ध में बंध जाते हैं। वर-वधू दोनों ही प्राकृतिक रूप से अलग कृतियाँ हैं; शरीर, मन, बुद्धि, कार्य-क्षमता व गुण एक-दूसरे से अलग ही हैं, शायद इसलिए ही उनका विवाह होता है; अगर एक जैसे ही होते तो इसकी जरूरत ही न पड़ती। लेकिन इसका गलत अर्थ निकालना और एक-दूसरे के जैसा बनने की कोशिश करना, पूरी तरह गलत दिशा में जाकर सामंजस्य व समर्पण की उम्मीद करना है। दोनों ही अपनी प्रकृति व गुणों के क्षेत्र में अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकते हैं, न कि किसी और के गुण-क्षेत्र में।

पति का अर्थ है वह जो सुरक्षा प्रदान करता है; जैसे ‘सेनापति’ शब्द से पता चलता है कि पति के इस रूप में वे सेना की सुरक्षा को आश्वस्त करते हैं, ‘गणपति’ स्वरूप में वे सभी गणों की सुरक्षा के लिए आश्वस्त करते हैं। इसी प्रकार आम भाषा में पति वह है, जो चहुँ ओर (शारीरिक, मानसिक, मर्यादा, संपत्ति) से अपनी भार्या की रक्षा करे। इसी प्रकार पत्नी का अर्थ है जो पति को पतन से बचाए, अर्थात समय-समय पर उसका मार्गदर्शन करती रहे।

नारी अस्य समाजस्य कुशलवास्तुकारा अस्ति। (नारी समाज की आदर्श शिल्पी है।)

मैंने अपने बचपन में शायद एक भी घर टूटते हुए नहीं देखा था, लेकिन पिछले कुछ ही वर्षों में न जाने कितने बसे हुए घरों को टूटकर बिखरते हुए देख चुका हूँ। मुझे अपार दुःख इस बात का है कि उनमें से अधिकतर लोग उच्च शिक्षा प्राप्त हैं, पर एक-दूसरे को उचित समय न दे पाना, सामंजस्य न बिठा पाना, एक-दूसरे को मान-सम्मान न देना, न ही एक-दूसरे को समझना, बल्कि अहं से भरकर अपने को ज्यादा स्मार्ट दिखाने के चक्कर में आक्रामक रवैया अपनाना और अपनी ही इच्छा के अनुसार कार्य करना—यह हमारे रिश्तों में दरार पैदा करता है। मन में जमा होती कुंठाओं के कारण धीरे-धीरे जब अधैर्य का सागर बढ़ता है, तो एक समय बाद धैर्य का बाँध टूट जाता है और मन में समाया सारा गुबार फटकर बह जाता है। जब मन की बातें वाणी से निकलती हैं, तो कटु शब्दों की वर्षा प्रारंभ होकर सम्बन्धों का अंत करके ही छोड़ती है।

लगातार हो रहे विवाद व पारिवारिक कलह के कारण परिवार का टूटना कोई नई बात नहीं है; अगर समाज की इकाई यानी परिवार टूटेगा, तो दृढ़ से दृढ़ समाज भी विघटित हो जाएगा।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अगर विवाह से पहले किसी का कोई पसंद-नापसंद या प्रेम-प्रसंग जैसा कुछ हो, तो उसे तुरंत समाप्त कर देना चाहिए। विवाह के उपरांत अगर किसी के मन में कुछ भी शेष बाकी रह गया, तो विवाह पर संकट आना अवश्यम्भावी है; और अगर न भी आए, तो उस अटूट पति-पत्नी के प्रेम और विश्वास के सरल धागे में मन के भीतर संदेह की गाँठें पड़ना स्वाभाविक है, जो फिर जीवन-पर्यंत कभी सामान्य नहीं हो पाता। यह स्वाभाविक है कि चाहे पति हो या पत्नी, किसी को भी एक-दूसरे के सिवा कोई और सम्बन्ध मन से स्वीकार न होगा, चाहे वह कितना ही सन्निकट मित्र क्यों न हो; इसे साधारण या छोटी बात मान लेना एक बड़ी भूल होती है।

मेरी समझ में पत्नी बनना और उसे निभाना बहुत कठिन व दुष्कर कार्य है; पूरा जीवन ही जैसे एक तपस्वी जैसा तपाना पड़ता है, वह भी सहनशीलता, शालीनता व विनम्रता की सुनहरी चादर ओढ़कर। एक सुघड़ पत्नी घर की लगभग सारी बड़ी चीजें तय करती है, लेकिन बड़ी सोच के साथ। घर में लोगों को भोजन में क्या पसंद है, लेकिन साथ ही उनके स्वास्थ्य के लिए क्या जरूरी है—कई बार तो वह स्वयं अपर्णा बनकर रहती हैं, पर परिवार के लिए अन्नपूर्णा बन जाती हैं।

आजकल खासकर बड़े शहरों में पैसा कमाने और भाग-दौड़ व जीवन की आपाधापी में दोनों पति-पत्नी अब केवल पति की भूमिका निभा रहे हैं; पैसे की सुरक्षा तो दे देंगे, चाहे मानसिक रूप से सुरक्षित रख पाएँ या नहीं। आक्रामक व्यवहार और अहं तो सीख ही लेंगे, भले ही एक भार्या का अलौकिक गुण—प्रेम, सहनशीलता व समर्पण—न सीख पाएँ। खाना बाहर से तो मँगा लेते हैं, पर स्वयं बनाने में परेशानी होती है, क्योंकि स्त्री हो या पुरुष, थककर चूर होने के बाद कोई क्या ही कार्य कर पाएगा; पैसा देकर भोजन लेना आसान है, स्वयं के परिश्रम व प्रसन्न भाव से भोजन बनाना कठिन है।

क्या ऐसी शिक्षा उचित है, जो केवल डिग्री लेकर पैसा कमाना सिखा देती है और भौतिकता, अहंकार व आक्रामक तेवर से भर देती है? ऐसी पुस्तकों के रटे हुए ज्ञान से क्या लाभ, जो विनम्रता, अहं रहित सरलता, कोमलता, दया व करुणा को ही न जगा पाए और समझ-बूझ से काम ही न ले? अनेकों बार देखा गया है कि अच्छे पढ़े-लिखे पति-पत्नी लगातार एक-दूसरे की बातों को काटते रहते हैं। यहाँ कोई प्रतिस्पर्धा तो होती नहीं है कि जीतने वाले को कोई पुरस्कार मिलेगा, पर एक अस्तित्व की लड़ाई लगती है कि मैं डिग्री वाला हूँ और पैसा कमा रहा हूँ, मैं दूसरे से कम कैसे हो गया हूँ। अहं के इस युद्ध में जीत चाहे जिसकी भी हो, पर हार तो पति-पत्नी के पावन सम्बन्ध की ही होती है। मन में जमा होते ये छोटे-छोटे विक्षोभ अनेक वर्षों में जमा होकर एक चक्रवात का रूप ले लेते हैं और एक चिंगारी से सब तहस-नहस हो जाता है। न जाने कितने लोगों को अधेड़ उम्र में अलग होते हुए देखा है; अगर ऐसी डिग्री और पैसे कमाने का यही परिणाम है, तो यह बड़ा ही दुखद है और इसका मतलब है हम बहुत उथलेपन से जुड़े थे।

आजकल पति-पत्नी दोनों ही व्यक्ति घर व बाहर के कार्य करते हैं, पर ऐसा प्रतीत होता है कि वे मन से न करके कार्य को निपटाने में ज्यादा विश्वास करते हैं। कहने भर को तो काम हो जाता है, पर उसमें न ही भाव होता है, न ही गुणवत्ता। वे अधिकतर उस प्रकार के कार्य ज्यादा करते हैं, जिसमें उनका मन करता है या जिसे वे पसंद करते हैं। अगर पत्नी को गाड़ी चलाना आता है, तो पति उससे ही बाहर के काम करा लेना चाहता है; और अगर पति भोजन बनाने में कुछ ठीक है, तो पत्नी वह काम उसी से करा लेना चाहती है। अब इन कामों में उनका मन लगता है कि नहीं, इस बात से दूसरे को कोई फर्क नहीं पड़ता।

उतार-चढ़ाव से भरे इस जीवन में जब दुःख-तकलीफ आती है, तो मानसिक तनाव का सामना होना अवश्यम्भावी हो जाता है; ऐसे में तू-तू, मैं-मैं होना स्वाभाविक है। एक-दूसरे के ऊपर जिम्मेदारी डालना एक सामान्य-सी बात है, क्योंकि दोनों को नौकरी भी करनी है और उन्नति के साथ-साथ पैसे भी ज्यादा चाहिए। अगर कार्य कम अच्छा है, तो सीधा असर उनकी नौकरी पर पड़ता है। एक सर्वे के दौरान देखा गया कि जब एक-दूसरे के प्रति ऐसे वाक्यों का प्रयोग होता है—‘तुम हमेशा से अपना बिस्तर खराब रखते हो… तुमसे कहते-कहते मैं मर गई, लेकिन मजाल है जो… एक बार रसोई में काम कर लोगे तो क्या हो जाएगा… तुम एक काम ठीक से नहीं कर सकते हो…’, ‘सब लोगों को ड्यूटी के लिए केवल तुम्हीं मिलते हो क्या? अब तुम छुट्टी लो…’—इसी प्रकार पुरुष भी अगर बोलता है कि ‘तुम अभी से थक गई, जबकि मैं तुमसे दस गुना ज्यादा काम करता हूँ… तुम भी तो पढ़ी-लिखी हो, यह काम तुम क्यों नहीं कर सकती हो…’—अगर ऐसे बोल बोले जाएँगे, तो ज्यादातर दंपत्तियों को मुश्किलें आनी तय हैं।

जिस पारिवारिक जीवन की विधा पर हम सबको गर्व था, वही जीवन-शैली आज हमारे लोभ, आक्रामक तेवरों एवं अहं की वजह से कम गुणवत्ता वाली होती जा रही है या फिर टूट-टूटकर बिखरती जा रही है।

अगर ऊपर लिखे उलाहना भरे शब्दों की जगह बोला जाए कि ‘मेरी थोड़ी मदद कर दोगे क्या? मुझे पता है, आज तुम पूरा दिन ड्यूटी करके बहुत थक गए हो, पर अगर यह एक काम कर दो तो मेरे लिए बहुत आसान हो जाएगा… तुम बहुत दिनों से घर का पूरा काम कर रही हो, आज पूरा आराम कर लो… पता नहीं तुम इतना सारा अलग-अलग प्रकार का काम कैसे कर लेती हो…’—शब्द तो वही होते हैं, पर थोड़ा सहजता और प्रेम-भाव से बोला जाए, तो परिणाम अच्छे व रिश्ते अनुकूल हो सकते हैं। मैंने और मेरे मित्रों ने यह अनुभूति की है कि कई बार सुबह-सवेरे की प्रणाम और नमस्ते के अभिवादन के समय ही यह एहसास हो जाता है कि यह स्त्री या पुरुष घर से लड़कर कार्य-क्षेत्र में पहुँचा है; अगर ऐसा है, तो कार्य की गुणवत्ता पर असर पड़ना स्वाभाविक है।

स्त्री-तत्त्व प्रधान गुण के कारण स्त्रियों को सहनशीलता, दया व विनम्रता की प्रतिमूर्ति माना जाता था, वहीं अब कुछ महिलाएँ भौतिक वस्तुओं के अर्जन के कारण अपने मूल गुणों से दूर होती जा रही हैं; लगभग यही हाल पुरुष-तत्त्व से सिंचित लोगों का भी है, जिसके कारण प्रेम के रिश्तों में खोखलापन आ रहा है। अहंकार, आक्रामकता, अधैर्य के चलते परिवार में कलह बढ़ रहा है। मेरी समझ में पति-पत्नी के बीच ‘अहं’ का भाव न होकर केवल ‘हम’ का भाव उत्पन्न हो जाए, तो जीवन ज्यादा सरल और सुंदर हो जाएगा।

सामान्यतः क्रोध का मूल कारण है—जब हम परिस्थितियों पर नियंत्रण नहीं कर पाते, जब कोई चीज हमारी इच्छा के विरुद्ध होती है, जब भी हमारे साथ अन्याय होता है, जब हम किसी चीज के प्रति अड़ जाते हैं या कई बार तो चीजें हमारी समझ व बुद्धि के बाहर होती हैं। चूँकि एक घर में पति-पत्नी ही सबसे ज्यादा एक-दूसरे से मिलते हैं व बात करते हैं, पर जब वही परेशान करने वाली चीजें बारम्बार होती हैं, तो वे नियंत्रण नहीं रख पाते हैं और क्रोध आ जाता है। दोनों में मतभेद हो जाना स्वाभाविक है, पर मनभेद उत्पन्न न हो, तो ज्यादा अच्छा है। कई बार अनबन का कारण बहुत छोटा होता है, पर अहंकार बहुत बड़ा; जिसके कारण कई दिनों तक बातचीत बंद रहती है। बाद में लगता है कि फालतू की बात में ही इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया।

कई बार आत्ममंथन से समाधान निकल आते हैं; ऐसा प्रतीत होता है कि ‘अकड़ने’ की बजाय अगर ‘कारण’ पर विचार किया जाए, तो शायद स्वयं पर भी नियंत्रण आ जाएगा।

काल-खंड बदलने के साथ-साथ सोच बदलती है। आजकल नई पीढ़ी के बच्चों में ज्यादा जोश व ऊर्जा होती है; वे तुरंत पसंद-नापसंद करके आगे की बात सोचने लगते हैं। ऐसे जल्दबाजी में लिए गए निर्णय अक्सर गलत परिणाम देते हैं। आजकल संयुक्त परिवारों का चलन कम होता जा रहा है और छोटे परिवार बढ़ रहे हैं। परिवार में वरिष्ठ लोगों के न रहने से बहुत-सी चीजें निरंकुश हो जाती हैं। ‘बदलाव’ ब्रह्माण्ड का शाश्वत नियम है; इसलिए पुराने संस्कारों को संजोकर और आधुनिकता के अच्छे गुणों को अपनाकर जीवन जिया जाना चाहिए।

एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप न करके परिस्थिति को संभालने पर ध्यान देना चाहिए। मोबाइल और बाहरी बातचीत का अत्यधिक उपयोग भी कलह का कारण बन रहा है। घर-परिवार का समय सीमित होता है; संतुलन न होने पर टकराव निश्चित है। कोई भी व्यक्ति सर्वगुण-संपन्न नहीं होता; कुछ कमियों को अनदेखा करना भी आवश्यक है।

घर में एक-दूसरे को समय देना बहुत महत्वपूर्ण है। अधिकतर बातें केवल साझा करने से ही सरल हो जाती हैं। मेरी समझ में दाम्पत्य जीवन की नैया को सुचारु रूप से चलाने के लिए सहनशीलता आवश्यक है। हर बार आक्रामक उत्तर देना जरूरी नहीं है। क्षमा माँगने से कोई छोटा नहीं होता, बल्कि इससे सम्मान बढ़ता है।

पति-पत्नी का अटूट बंधन हमारी संस्कृति की नींव है। इस प्रेमपूर्ण सम्बन्ध में ही समाज की स्थिरता छिपी है। हमें अपनी विरासत को आगे बढ़ाना चाहिए।

घर में शांति चाहिए और परिवार को बिखरने से बचाना है, तो यह जरूरी है कि कोई भी आग में घी डालने का काम न करे। एक क्रोधित हो, तो दूसरा शांत रहे; एक थका हो, तो दूसरा सहयोग करे। संतुलन और समझदारी से ही जीवन सुधरता है।

जिस प्रकार भीष्म पितामह को अंत में अपनी भूल का एहसास हुआ, वैसे ही जीवन में देर न हो जाए—इससे पहले ही सम्बन्धों को संभालना आवश्यक है।

कोई किसी से कम नहीं होता; पति और पत्नी दोनों की अपनी महत्ता है और दोनों की अपनी विशेषता। दोनों के बिना घर पूर्ण नहीं होता, पर उससे भी जरूरी है एक-दूसरे के लिए समर्पण, सम्मान और बिना शर्त सामंजस्य, जिससे कि मनुष्य के गृहस्थ जीवन की छुक-छुक करती रेलगाड़ी दोनों पटरियों पर समान बोझ डालकर बिना रुकावट के सरपट दौड़ती रहे।