IIT मद्रास के 6 प्रोफेसरों की बड़ी कामयाबी: जानिए किन खोजों के लिए जेसी बोस ग्रांट से हुए सम्मानित

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (IIT मद्रास) ने देश के अनुसंधान क्षेत्र में एक बार फिर अपनी श्रेष्ठता साबित की है। संस्थान के छह वरिष्ठ प्राध्यापकों को ‘अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन’ (ANRF) के प्रतिष्ठित जेसी बोस ग्रांट से सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार देश में विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उत्कृष्ट और लगातार बेहतर […]

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (IIT मद्रास) ने देश के अनुसंधान क्षेत्र में एक बार फिर अपनी श्रेष्ठता साबित की है। संस्थान के छह वरिष्ठ प्राध्यापकों को ‘अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन’ (ANRF) के प्रतिष्ठित जेसी बोस ग्रांट से सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार देश में विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उत्कृष्ट और लगातार बेहतर शोध करने वाले वरिष्ठ वैज्ञानिकों को दिया जाता है।

इस राष्ट्रीय सम्मान से न केवल आईआईटी मद्रास की साख बढ़ी है, बल्कि इससे भारत में हो रहे अत्याधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों को भी गति मिलेगी। इस ग्रांट के तहत चुने गए सभी छह प्रोफेसरों को उनके शोध को आगे बढ़ाने के लिए अगले 5 वर्षों तक हर साल 25 लाख रुपये (कुल 1.25 करोड़ रुपये) का भारी-भरकम फंड मिलेगा।

किसे मिलता है यह सम्मान?

ANRF जेसी बोस ग्रांट 45 से 65 वर्ष की आयु के उन सक्रिय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को प्रदान किया जाता है, जिनके पास शोध के क्षेत्र में असाधारण उपलब्धियों का रिकॉर्ड हो। इस अनुदान राशि का इस्तेमाल शोधकर्ता नई लैब तकनीक विकसित करने, आधुनिक उपकरण खरीदने, रिसर्च स्कॉलर्स और वैज्ञानिकों की टीम तैयार करने, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में हिस्सा लेने और प्रयोगशाला के जरूरी सामानों का खर्च पूरा करने के लिए कर सकते हैं।

इस शानदार उपलब्धि पर आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामाकोटी ने सभी विजेताओं को बधाई दी। उन्होंने कहा, “मैं अपने सभी सम्मानित सहयोगियों को बधाई देता हूँ। यह पुरस्कार इस बात का सीधा प्रमाण है कि आईआईटी मद्रास में गंभीर और उभरती हुई तकनीकों पर कितना उच्च स्तरीय शोध और विकास कार्य हो रहा है।”

आईआईटी मद्रास के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग में कार्यरत प्रोफेसर सुजाता श्रीनिवासन ‘टीटीके सेंटर फॉर रिहैबिलिटेशन रिसर्च एंड डिवाइस डेवलपमेंट’ और ‘नेशनल सेंटर फॉर असिस्टिव हेल्थ टेक्नोलॉजीज’ की प्रमुख हैं। इन्होंने अपने करियर में मुख्य रूप से विकलांग और चलने-फिरने में असमर्थ लोगों की मदद के लिए काम किया है।

प्रो. सुजाता और उनकी टीम ने भारतीय जीवन शैली को ध्यान में रखते हुए कई किफायती उपकरण बनाए हैं। इनमें बाजार में आ चुका ‘नियोफ्लाई-नियोबोल्ट’ सिस्टम, जमीन से आसानी से खड़े होने में मदद करने वाली ‘स्टैंडिंग व्हीलचेयर’, देश में विकसित ‘कदम’ प्रोस्थेटिक घुटना और हल्का ‘वाईडी वन’ (YD One) व्हीलचेयर शामिल हैं। उनके पास दिव्यांगता से जुड़े उपकरणों के कई भारतीय और अंतरराष्ट्रीय पेटेंट भी दर्ज हैं।

रसायन विज्ञान (केमिस्ट्री) विभाग के इंस्टीट्यूट प्रोफेसर, थलप्पिल प्रदीप को स्वच्छ जल प्रौद्योगिकियों, नैनोमैटेरियल्स और माइक्रोड्रॉपलेट्स के क्षेत्र में दुनिया भर में जाना जाता है। पद्मश्री, विज्ञान श्री, एनि अवॉर्ड (Eni Award) और विनफ्यूचर प्राइज (VinFuture Prize) से सम्मानित प्रो. प्रदीप दुनिया की 10 प्रमुख अकादमियों के फेलो हैं।

उनकी विकसित की गई सस्ती जल शोधन (वाटर प्यूरीफिकेशन) तकनीकों की वजह से आज पूरे भारत में करोड़ों लोगों को पीने का सुरक्षित पानी मिल रहा है। उन्होंने प्रयोगशाला की खोजों को समाज तक पहुँचाने के लिए ‘आईआईटी मद्रास रिसर्च पार्क’ में ‘इंटरनेशनल सेंटर फॉर क्लीन वाटर’ की स्थापना भी की है। प्रो. प्रदीप के लिए जेसी बोस पुरस्कार का यह लगातार तीसरा 5-वर्षीय कार्यकाल (कुल 15 वर्ष) है।

इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग की मार्ती अन्नपूर्णा गुरुनाथ चेयर प्रोफेसर, दीपा वेंकटेश देश की संचार व्यवस्था को नई ताकत देने में जुटी हैं। वह ‘एडवांस्ड ऑप्टिकल कम्युनिकेशन टेस्टबेड’ प्रोजेक्ट की लीडर हैं, जो भारत सरकार के दूरसंचार विभाग द्वारा पोषित एक बड़ा अकादमिक-उद्योग साझेदारी उपक्रम है।

इस परियोजना के तहत आईआईटी मद्रास में देश का पहला ‘मल्टीकोर फाइबर फील्ड टेस्टबेड’ तैयार किया गया है। प्रो. दीपा की टीम ऑप्टिकल फाइबर संचार में कई स्वदेशी समाधान विकसित कर रही है। अब्दुल कलाम टेक्नोलॉजी इनोवेशन नेशनल फेलोशिप प्राप्त प्रो. दीपा कई अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रों और पेटेंट की लेखक हैं तथा प्रसिद्ध ‘IEEE जर्नल ऑफ लाइटवेव टेक्नोलॉजी’ की एसोसिएट एडिटर भी हैं।

केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर जितेंद्र एस. सांगवे का मुख्य शोध कार्य पर्यावरण को बचाने के लिए कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड सीक्वेस्ट्रेशन (CCUS), गैस हाइड्रेट्स और तेल एवं गैस इंजीनियरिंग पर केंद्रित है। वातावरण से जहरीली कार्बन डाइऑक्साइड गैस को सोखने और उसे उपयोगी बनाने पर उनकी रिसर्च बेहद अहम मानी जाती है।

प्रो. सांगवे 200 से अधिक जर्नल पेपर्स लिख चुके हैं। उनका ‘h-इंडेक्स’ 60 है और उनके शोध को लगभग 11,000 साइटेशन (उद्धरण) मिल चुके हैं। 43 पेटेंट अपने नाम करा चुके प्रो. सांगवे को ‘नेशनल जियोसाइंस अवॉर्ड’ से सम्मानित किया जा चुका है और वे भारत के शीर्ष 3% सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले ACS लेखकों में शामिल हैं। वे INAE और NASI अकादमियों के फेलो भी हैं।

अप्लाइड मैकेनिक्स और बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर रामकृष्णन स्वामीनाथन ने मेडिकल डिवाइस डिजाइनिंग और बायोमेडिकल इंस्ट्रूमेंटेशन के क्षेत्र में असाधारण काम किया है। उनका शोध मुख्य रूप से मानव मस्तिष्क और मांसपेशियों की कार्यप्रणाली का सटीक विश्लेषण करने वाले उपकरणों पर केंद्रित है।

अपने लंबे करियर में उन्होंने 550 से अधिक शोध पत्र लिखे हैं और 50 से ज्यादा रिसर्च स्कॉलर्स का मार्गदर्शन किया है। प्रो. स्वामीनाथन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी लोकप्रिय शोधकर्ता हैं। वे चिकित्सा उपकरणों के अंतरराष्ट्रीय नियमों और मानकों को एक समान बनाने के लिए वैश्विक मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं।

रसायन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर सुंदरगोपाल घोष ‘ट्रांजिशन मेटल बोरोन केमिस्ट्री’ के क्षेत्र में भारत के अग्रणी वैज्ञानिक हैं। उनका व्यापक शोध बोरोन-आधारित आणविक प्रणालियों (molecular systems) की संरचना, इलेक्ट्रॉनिक बॉन्डिंग और रासायनिक प्रतिक्रियाओं को गहराई से समझने पर आधारित है।

उनके इस शोध से विशेष रूप से उत्प्रेरक और छोटे अणुओं के एक्टिवेशन के क्षेत्र में प्रगति हुई है, जो भविष्य में नई दवाओं और औद्योगिक रसायनों के निर्माण में मदद करती है। प्रो. घोष के 325 से अधिक शोध पत्र दुनिया के जाने-माने जनरलों में छप चुके हैं। वे INSA, IASc और NASI जैसी देश की तीनों प्रमुख राष्ट्रीय विज्ञान अकादमियों के सम्मानित फेलो हैं।

देश में लगातार नंबर-1 है आईआईटी मद्रास

1959 में स्थापित आईआईटी मद्रास भारत सरकार का एक राष्ट्रीय महत्व का संस्थान है। केंद्र सरकार की नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF 2025) में आईआईटी मद्रास ने लगातार 7वें साल ‘ओवरऑल’ कैटेगरी में देश में पहला स्थान हासिल किया है।

वहीं, ‘इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूशंस’ की श्रेणी में यह संस्थान लगातार 10 सालों (2016 से 2025) से भारत में नंबर-1 बना हुआ है। इसके अलावा 2025 में शुरू हुई ‘सतत विकास लक्ष्य’ श्रेणी और इनोवेशन श्रेणी में भी इसे पहला स्थान मिला है। संस्थान ने 2023 में तंजानिया के ज़ांज़ीबार में अपना पहला अंतरराष्ट्रीय परिसर भी स्थापित किया है।