एम्स के शोध में बड़ा खुलासा: योग ने गठिया की जड़ पर किया प्रहार, मिली राहत
रोगियों पर हुए अध्ययन में सामने आया असर; प्रतिरक्षा तंत्र का संतुलन सुधरा, सूजन घटी और बीमारी की सक्रियता कम हुई अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) नई दिल्ली के एक महत्वपूर्ण अध्ययन में सामने आया है कि नियमित योग रूमेटॉयड आर्थराइटिस यानी गठिया की गंभीर ऑटोइम्यून बीमारी को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभा सकता […]
रोगियों पर हुए अध्ययन में सामने आया असर; प्रतिरक्षा तंत्र का संतुलन सुधरा, सूजन घटी और बीमारी की सक्रियता कम हुई
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) नई दिल्ली के एक महत्वपूर्ण अध्ययन में सामने आया है कि नियमित योग रूमेटॉयड आर्थराइटिस यानी गठिया की गंभीर ऑटोइम्यून बीमारी को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभा सकता है। आठ सप्ताह तक योग करने वाले मरीजों में न केवल दर्द और सूजन में कमी दर्ज की गई, बल्कि प्रतिरक्षा तंत्र में ऐसे बदलाव भी देखे गए जो बीमारी को बढ़ाने वाली जैविक प्रक्रियाओं को संतुलित करने से जुड़े हैं।
अध्ययन में पाया गया कि योग करने वाले मरीजों में सूजन बढ़ाने वाली प्रतिरक्षा कोशिकाओं का स्तर घटा, प्रतिरक्षा संतुलन बेहतर हुआ और बीमारी की सक्रियता में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। शोध से यह भी संकेत मिला कि योग बीमारी की जड़ से जुड़ी उन प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है जो लंबे समय तक सूजन और जोड़ों को नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार मानी जाती हैं।
यह अध्ययन एम्स के रूमेटोलॉजी विभाग, एनाटॉमी विभाग और बायोकेमिस्ट्री विभाग के सहयोग से किया गया। शोध पत्र की प्रथम लेखिका सुरभि गौतम हैं। अध्ययन में रूमेटोलॉजी विभाग की प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. उमा कुमार, एनाटॉमी विभाग की प्रोफेसर डॉ. रीमा दादा तथा अन्य विशेषज्ञ शामिल रहे। अध्ययन के निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुए हैं।
शोध में 18 से 60 वर्ष आयु वर्ग के 64 रूमेटॉयड आर्थराइटिस मरीजों को शामिल किया गया। यह एक रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल था। सभी मरीज पहले से नियमित दवा उपचार ले रहे थे। इनमें से 32 मरीजों को आठ सप्ताह के विशेष योग कार्यक्रम से जोड़ा गया, जबकि 32 मरीज केवल सामान्य चिकित्सा उपचार लेते रहे।
योग कार्यक्रम में योगासन, प्राणायाम, ध्यान, विश्राम तकनीक और तनाव प्रबंधन से जुड़े अभ्यास शामिल थे। प्रतिभागियों ने सप्ताह में पांच दिन और प्रतिदिन लगभग दो घंटे योग किया। अध्ययन के दौरान मरीजों के रक्त नमूनों, प्रतिरक्षा कोशिकाओं, सूजन से जुड़े जैविक संकेतकों और जीन अभिव्यक्ति का विश्लेषण किया गया।
बीमारी की सक्रियता में कमी
अध्ययन में पाया गया कि योग करने वाले मरीजों में बीमारी की सक्रियता का स्तर कम हुआ। कई मरीजों में जोड़ों के दर्द, सूजन और अकड़न में सुधार देखा गया। दैनिक जीवन के कामकाज करने की क्षमता भी पहले की तुलना में बेहतर हुई। रूमेटोलॉजी विभाग की टीम के अनुसार यह सुधार केवल लक्षणों तक सीमित नहीं था। शरीर के भीतर भी ऐसे बदलाव दिखाई दिए जो बीमारी को नियंत्रित करने में मददगार माने जाते हैं।
रूमेटॉयड आर्थराइटिस केवल जोड़ों की बीमारी नहीं है, बल्कि यह शरीर के कई अंगों को प्रभावित कर सकती है। योग एक समग्र पद्धति है, जो बीमारी के शारीरिक और मानसिक दोनों पहलुओं पर काम करती है और मरीजों की जीवन गुणवत्ता बेहतर बनाने में मदद कर सकती है। – डॉ. उमा कुमार, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, रूमेटोलॉजी विभाग, एम्स दिल्ली
अध्ययन में सूजन से जुड़े जैविक संकेतकों, प्रतिरक्षा संतुलन और जीन अभिव्यक्ति में सकारात्मक बदलाव देखे गए। योग करने वाले मरीजों में प्रतिरक्षा कोशिकाओं की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया धीमी हुई और प्रतिरक्षा संतुलन बहाल होने के संकेत मिले। – प्रोफेसर डॉ. रीमा दादा, एनाटॉमी विभाग, एम्स दिल्ली
प्रतिरक्षा तंत्र का संतुलन बेहतर हुआ
अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रतिरक्षा तंत्र से जुड़ा रहा। रूमेटॉयड आर्थराइटिस में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपने ही जोड़ों और ऊतकों पर हमला करने लगती है। इसकी एक बड़ी वजह प्रतिरक्षा कोशिकाओं के बीच बिगड़ा संतुलन माना जाता है।
अध्ययन में पाया गया कि योग करने वाले मरीजों में टीएच-17 कोशिकाओं का स्तर कम हुआ। ये कोशिकाएं शरीर में सूजन बढ़ाने का काम करती हैं। दूसरी ओर टी-रेग कोशिकाओं की संख्या बढ़ी। ये कोशिकाएं प्रतिरक्षा तंत्र को नियंत्रित रखने और संतुलन बनाए रखने में मदद करती हैं।
एम्स की शोध टीम के अनुसार रूमेटॉयड आर्थराइटिस में इन दोनों प्रकार की कोशिकाओं के बीच संतुलन बिगड़ जाता है। योग के बाद इस संतुलन में सुधार देखा गया, जो बीमारी को नियंत्रित करने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
सूजन बढ़ाने वाले संकेतकों में गिरावट
अध्ययन के दौरान रक्त में मौजूद कई जैविक संकेतकों की जांच की गई। परिणामों में पाया गया कि शरीर में सूजन बढ़ाने वाले प्रमुख संकेतक आईएल-6 और आईएल-17 का स्तर कम हुआ।
इन दोनों का संबंध गठिया की सूजन और बीमारी की गंभीरता से माना जाता है। वहीं शरीर में सूजन को नियंत्रित करने वाली प्रक्रियाओं में सुधार देखा गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यही कारण है कि योग करने वाले मरीजों में बीमारी की सक्रियता कम दिखाई दी।
कोशिकाओं की उम्र बढ़ने की रफ्तार घटी
अध्ययन का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रतिरक्षा कोशिकाओं की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया से जुड़ा है। शोधकर्ताओं ने पाया कि योग करने वाले मरीजों में समय से पहले बूढ़ी हो रही टी-कोशिकाओं की संख्या कम हुई।
एनाटॉमी विभाग की प्रोफेसर डॉ. रीमा दादा के अनुसार यह निष्कर्ष विशेष महत्व रखता है, क्योंकि ऑटोइम्यून बीमारियों में प्रतिरक्षा कोशिकाओं का तेजी से बूढ़ा होना लगातार सूजन और बीमारी की प्रगति से जुड़ा माना जाता है।
जीनों के स्तर पर भी दिखा असर
अध्ययन केवल लक्षणों और रक्त परीक्षण तक सीमित नहीं रहा। एनाटॉमी विभाग और बायोकेमिस्ट्री विभाग से जुड़े विश्लेषण में जीन अभिव्यक्ति और एपिजेनेटिक बदलावों का भी अध्ययन किया गया।
परिणामों में पाया गया कि योग के बाद कई ऐसे जीन कम सक्रिय हुए जो सूजन और ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया को बढ़ावा देते हैं। वहीं कुछ ऐसे जीन अधिक सक्रिय हुए जो प्रतिरक्षा संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।
शोध टीम का कहना है कि इससे संकेत मिलता है कि योग केवल लक्षणों पर नहीं, बल्कि बीमारी से जुड़ी जैविक प्रक्रियाओं पर भी असर डाल सकता है।
क्या है रूमेटॉयड आर्थराइटिस?
रूमेटॉयड आर्थराइटिस एक पुरानी ऑटोइम्यून बीमारी है। इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अपने ही जोड़ों पर हमला करने लगती है। इसके कारण दर्द, सूजन और अकड़न की समस्या होती है। समय के साथ जोड़ों को स्थायी नुकसान भी पहुंच सकता है। यह बीमारी केवल जोड़ों तक सीमित नहीं रहती। गंभीर मामलों में इसका असर हृदय, फेफड़ों, रक्त वाहिकाओं और शरीर के अन्य अंगों पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि इसे पूरे शरीर को प्रभावित करने वाली बीमारी माना जाता है।
योग दवा का विकल्प नहीं
अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि योग को दवाओं का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। अध्ययन के दौरान सभी मरीज नियमित रूप से अपनी दवाएं लेते रहे। योग को उपचार के साथ जोड़े गए एक सहायक उपाय के रूप में शामिल किया गया था।
शोध टीम का मानना है कि आधुनिक चिकित्सा और योग का संयोजन मरीजों को अतिरिक्त लाभ पहुंचा सकता है। इससे बीमारी को नियंत्रित करने, तनाव कम करने और जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
ऑटोइम्यून बीमारियों के बढ़ते मामलों के बीच एम्स का यह अध्ययन महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अध्ययन से संकेत मिलता है कि नियमित योग केवल शरीर को सक्रिय रखने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह प्रतिरक्षा तंत्र को संतुलित करने और बीमारी से जुड़ी सूजन को कम करने में भी अहम भूमिका निभा सकता है।
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