‘हमारा चला गया, किसी और का बच जाए’: अपनों को खोकर दूसरों को नई ज़िंदगी देने वाले 38 परिवारों को नमन”
एम्स में ‘अंगदान जीवन संजीवनी अभियान’ के समापन पर सम्मानित हुए अमर डोनर्स के परिजन; गम के अंधेरे में मानवता के उस उजाले की कहानी, जो किसी की बुझती सांसों को नई धड़कन दे गया। अस्पताल के आईसीयू (ICU) का वह शांत कमरा। जहां मॉनिटर पर चलती ‘बीप-बीप’ की आवाजें अचानक रुकने लगती हैं। डॉक्टर […]
एम्स में ‘अंगदान जीवन संजीवनी अभियान’ के समापन पर सम्मानित हुए अमर डोनर्स के परिजन; गम के अंधेरे में मानवता के उस उजाले की कहानी, जो किसी की बुझती सांसों को नई धड़कन दे गया।
अस्पताल के आईसीयू (ICU) का वह शांत कमरा। जहां मॉनिटर पर चलती ‘बीप-बीप’ की आवाजें अचानक रुकने लगती हैं। डॉक्टर जब भारी दिल और झुकती नजरों से परिजनों से कहते हैं— “माफ कीजिएगा, अब ब्रेन डेथ हो चुकी है…”
उस पल मानो परिजनों की पूरी दुनिया ही एक झटके में ठहर जाती है। आंखों के सामने से कलेजे का टुकड़ा, घर का इकलौता चिराग या जिंदगी का सबसे अजीज हमसफर सदा के लिए ओझल होने की कगार पर खड़ा होता है। लेकिन जरा सोचिए, उस अथाह गम, आंसुओं और टूटते सपनों के बीच अगर कोई मां, पिता या भाई अपने आंसुओं को पोंछकर यह कहे— “हमारा अपना तो नहीं रहा, लेकिन उसके अंग किसी और के जिस्म में धड़कते रहें, उसकी आंखें किसी और की दुनिया को रोशन कर दें…”
यह केवल एक फैसला नहीं है। यह इंसानियत का सबसे बड़ा चमत्कार है। 1 अगस्त 2026 को नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) का प्रेक्षागृह ऐसे ही 38 महान परिवारों के अभूतपूर्व त्याग का साक्षी बना।

मौका था ‘ऑर्गन रिट्रीवल बैंकिंग ऑर्गनाइजेशन’ (ORBO) द्वारा आयोजित वार्षिक डोनर फेलिसिटेशन प्रोग्राम का। इस कार्यक्रम में अंगदान, ऊतक दान (टिश्यू डोनेशन) और संपूर्ण देहदान करने वाले अमर डोनर्स को भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई और उनके परिजनों को सम्मानित किया गया।
अंगदान की अमर गाथाएं: दर्द से उम्मीद की ओर

कहानी नंबर 1 : उम्मीद का दीया
गाजियाबाद की 26 वर्षीय प्रियंका यादव अपने परिवार की इकलौती कमाऊ सदस्य थीं। बीमार मां का ध्यान रखना और अपने दो छोटे भाइयों के भविष्य को संवारना ही उनकी जिंदगी का मकसद था। शांत और मजबूत इरादों वाली प्रियंका जब नैनीताल से लौट रही थीं, तब एक दर्दनाक सड़क हादसे ने उनसे उनकी जिंदगी छीन ली।
4 मार्च 2026 को डॉक्टरों ने उन्हें ‘ब्रेन डेड’ घोषित कर दिया। जिस उम्र में बेटियां अपने और अपने परिवार के सुनहरे भविष्य के सपने बुनती हैं, उस उम्र में प्रियंका का यूं चले जाना परिवार पर दुखों का पहाड़ टूटने जैसा था।
लेकिन इस असह्य दर्द के बीच भी प्रियंका के परिवार ने अप्रतिम साहस दिखाया। उन्होंने प्रियंका की दोनों किडनियां, लिवर, हार्ट वाल्व और दोनों कॉर्निया (आंखें) दान करने का फैसला किया। प्रियंका भले ही आज physically दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी दी हुई सांसें, उनकी धड़कनें और उनकी नजरें आज कई जरूरतमंदों के शरीर में नई सांसें भर रही हैं।
कहानी नंबर 2 : सागर का दिल
23 साल का सागर अपनी असीमित ऊर्जा, गर्माहट और दूसरों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहने वाले स्वभाव के लिए जाना जाता था। 19 जुलाई 2026 को एक दर्दनाक बाइक दुर्घटना में उसकी मोटरसाइकिल फिसल गई और उसे गंभीर चोटें आईं। एम्स के डॉक्टरों की हर संभव कोशिश के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका और उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया।
अचानक हुए इस हादसे से पूरा परिवार बिखर चुका था। लेकिन वे जानते थे कि सागर का पूरा जीवन ही दूसरों की मदद करने का नाम था। परिजनों ने अपने आंसुओं को रोककर हिम्मत जुटाई और सागर की दोनों किडनियां, लिवर, हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान करने की सहमति दे दी।
सागर की मदद करने की यह आखिरी आदत आज कई जिंदगियों को नया जीवन दे चुकी है। जिस सागर ने अपनी जिंदगी में हर किसी का हाथ थामा, उसने दुनिया से जाते-जाते भी वही किया।
कहानी नंबर 3 : जीवन का उपहार
दिल्ली के 37 वर्षीय घनश्याम कश्यप का जीवन सामान्य रूप से चल रहा था। 13 फरवरी 2026 को घर पर ही अचानक गिर जाने से उनके सिर में गंभीर चोट लग गई। उन्हें तत्काल एम्स लाया गया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। डॉक्टरों ने उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया।
बिना किसी पूर्व चेतावनी के आई इस आपदा से पूरा परिवार गहरे सदमे में था। लेकिन इस मुश्किल घड़ी में घनश्याम के परिवार ने दूसरों के जीवन में दीपक जलाने का संकल्प लिया। उन्होंने घनश्याम के दोनों फेफड़े (लंग्स), दोनों किडनियां, लिवर, हार्ट वाल्व और दोनों कॉर्निया दान कर दिए।
घनश्याम के फेफड़ों ने किसी की रुकी हुई सांसों को फिर से गति दी, और उनकी आंखों ने किसी के अंधेरे जीवन को रोशन कर दिया।
देहदान का संकल्प
समारोह में केवल वे परिवार ही शामिल नहीं थे जिन्होंने हादसों के बाद अंगदान किया, बल्कि उन चार महान हस्तियों के परिजनों को भी सम्मानित किया गया, जिन्होंने अपने जीवनकाल में ही एम्स के ORBO केंद्र में संपूर्ण देहदान का संकल्प लिया था:
- श्रीमती ईश्वर कौर (77 वर्ष): वर्ष 2013 में देहदान का संकल्प लिया था। निधन के बाद उनकी संपूर्ण देह, त्वचा और कॉर्निया का दान हुआ।
- श्री सरदारी लाल खुराना (90 वर्ष): वर्ष 2014 में संकल्प लिया था। निधन के बाद संपूर्ण देह और कॉर्निया दान किए गए।
- श्रीमती जयमाला गुप्ता (89 वर्ष): वर्ष 2018 में संकल्प लिया था। निधन के बाद संपूर्ण देह और कॉर्निया का दान हुआ।
- श्री एन.पी. दत्ता (86 वर्ष): वर्ष 2023 में संकल्प लिया था। निधन के बाद संपूर्ण देह का दान किया गया।
एम्स निदेशक का संदेश
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और एम्स नई दिल्ली के निदेशक प्रो. निखिल टंडन ने डोनर परिवारों के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त की।
“अंगदान और ऊतक दान हर साल एंड-स्टेज ऑर्गन फेलियर से जूझ रहे मरीजों को नई जिंदगी देता है। हमें मिलकर जागरूकता फैलानी होगी, भ्रांतियों को दूर करना होगा और अंगदान के प्रति अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण बनाना होगा।”
डोनर परिवारों के त्याग को याद करते हुए प्रो. टंडन ने कहा:
“निजी दुख के सबसे कठिन क्षणों में भी इन परिवारों ने समाज की मदद करने और दूसरों की जान बचाने का फैसला किया। जिस मानसिक और भावनात्मक दौर से ये परिवार गुजरते हैं, उसकी कल्पना करना भी आसान नहीं है। ऐसे में उनका यह निर्णय बेहद प्रेरणादायक और अनुकरणीय है।”
प्रो. टंडन ने बताया कि भारत में अंगदान की व्यवस्था का विकास बहुत व्यवस्थित रहा है। पहले मुख्य रूप से जीवित डोनर्स के माध्यम से ही किडनी ट्रांसप्लांट किए जाते थे। लेकिन अब ‘ब्रेन-डेड’ डोनर्स के अंग भी जरूरतमंद मरीजों का जीवन बचाने में क्रांतिकारी भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मृत्यु के बाद भी कॉर्निया और स्किन जैसे ऊतक दान किए जा सकते हैं, क्योंकि इसके लिए शरीर में तुरंत रक्त संचार की आवश्यकता नहीं होती।

जटिल चिकित्सा प्रक्रिया और 24 घंटे का तंत्र
एम्स में ORBO की प्रोफेसर इन-चार्ज प्रो. आरती विज ने इस बात पर जोर दिया कि अंगदान केवल एक चिकित्सीय फैसला नहीं, बल्कि एक बेहद जटिल प्रशासनिक और मेडिकल समन्वय है।
“अंगों को प्राप्त करने से लेकर प्रत्यारोपण तक (Retrieval to Transplantation) की प्रक्रिया एक जटिल श्रृंखला है। इसमें डोनर परिवारों, ट्रांसप्लांट संयोजकों, डॉक्टरों, फॉरेंसिक टीमों, प्रयोगशालाओं और पुलिस प्रशासन के बीच हर सेकंड में सटीक तालमेल जरूरी होता है।”
एम्स में ORBO की प्रोफेसर इन-चार्ज प्रो. आरती विज
प्रो. विज ने जानकारी दी कि एम्स में हर मृत्यु की अनिवार्य सूचना (mandatory notification) देने की प्रणाली लागू है, जिसकी निगरानी ORBO के समन्वय अधिकारी 24 घंटे करते हैं। संस्था ने अब तक 1,356 रेजिडेंट डॉक्टरों और 1,463 क्रिटिकल केयर नर्सों को इस संवेदनशील प्रक्रिया का विशेष प्रशिक्षण दिया है।
‘अंगदान जीवन संजीवनी अभियान’: जागरूकता की नई लहर
ORBO द्वारा 14 जुलाई से 1 अगस्त 2026 तक ‘अंगदान जीवन संजीवनी अभियान’ के तहत अंगदान पखवाड़े (Organ Donation Fortnight) का आयोजन किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य समाज में फैली भ्रांतियों को मिटाना था:
- स्कूली बच्चों की भागीदारी: पेबल पेंटिंग, पोस्टर डिजाइन और कैंपेन मेकिंग प्रतियोगिताओं के जरिए छात्रों को भविष्य का ‘अंगदान एंबेसडर’ बनाया गया।
- जन-जागरूकता गतिविधियां: एम्स स्टाफ व आम जनता को जोड़ने के लिए माइम शो, रस्साकशी (टग ऑफ वार) और एक दोस्ताना क्रिकेट मैच आयोजित किया गया।
- सामूहिक संकल्प: आम जनता और डॉक्टरों के लिए मास प्लेजिंग (अंगदान संकल्प) ड्राइव चलाई गई।
समारोह में एम्स की डीन (रिसर्च) डॉ. राधिका टंडन, अपर निदेशक अंशुल मिश्रा (IAS), दधीचि देह दान समिति, राधा स्वामी सत्संग ब्यास, लक्ष्मी नारायण ट्रस्ट और भोर लिविंग ह्यूमनली फाउंडेशन जैसी अग्रणी संस्थाओं के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे।
अमरता का मार्ग
जिंदगी की अंतिम सांस के साथ सब कुछ खत्म हो जाए, ऐसा जरूरी नहीं है। एम्स में सम्मानित हुए 38 परिवारों ने यह साबित कर दिया कि अपनों को खोने के असीम दर्द में भी अगर इंसानियत का भाव जीवित रहे, तो बुझती हुई सांसों से भी कई नए जीवन रोशन किए जा सकते हैं।
अंगदान किसी इंसान द्वारा दूसरे इंसान को दिया जाने वाला सबसे पावन और अनमोल उपहार है— जो किसी का कल संवारता है और दानवीर को इतिहास के पन्नों में अमर कर देता है।
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