स्पेशल रिपोर्ट: मिर्गी के मरीजों के लिए वरदान ‘योग थेरेपी’: एम्स की रिसर्च में बड़ा खुलासा
दवा के साथ नियमित योग करने से 7.4 गुना तक बढ़ जाती है दौरों से मुक्ति मिलने की संभावना; बीमारी से जुड़ी सामाजिक झिझक, घबराहट और डिप्रेशन भी होता है खत्म। मिर्गी (Epilepsy) से जूझ रहे दुनिया भर के करोड़ों मरीजों के लिए भारत के चिकित्सा विज्ञान जगत से एक बेहद सुखद और क्रांतिकारी खबर […]
दवा के साथ नियमित योग करने से 7.4 गुना तक बढ़ जाती है दौरों से मुक्ति मिलने की संभावना; बीमारी से जुड़ी सामाजिक झिझक, घबराहट और डिप्रेशन भी होता है खत्म।
मिर्गी (Epilepsy) से जूझ रहे दुनिया भर के करोड़ों मरीजों के लिए भारत के चिकित्सा विज्ञान जगत से एक बेहद सुखद और क्रांतिकारी खबर आई है। देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित अस्पताल, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली के डॉक्टरों ने एक बेहद कड़े वैज्ञानिक शोध में यह साबित कर दिया है कि अगर मिर्गी के मरीज अपनी नियमित दवाओं के साथ-साथ सही और वैज्ञानिक तरीके से ‘योग’ को अपनी दिनचर्या में शामिल कर लें, तो उनके ठीक होने की रफ्तार कई गुना बढ़ जाती है।
इस रिसर्च का सबसे बड़ा और चमत्कारी नतीजा यह रहा है कि योग करने वाले मरीजों में मिर्गी के दौरों से पूरी तरह मुक्ति मिलने (यानी सीज़र रिमिशन) की संभावना आम मरीजों के मुकाबले करीब 7.4 गुना ज्यादा देखी गई। इसके साथ ही, मिर्गी के कारण समाज में महसूस होने वाले अकेलेपन, हीन भावना और झिझक (स्टिग्मा) में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। यह खोज मिर्गी के मरीजों के लिए एक नई सुबह की तरह है, जो उन्हें सामान्य और गरिमापूर्ण जीवन जीने की बड़ी उम्मीद देती है।
इस ऐतिहासिक और जीवन बदलने वाली रिसर्च का नेतृत्व एम्स नई दिल्ली के न्यूरोलॉजी विभाग की अध्यक्ष डॉ. मंजरी त्रिपाठी और उनकी सहयोगी डॉ. किरणदीप कौर ने किया। इस बड़े मिशन में एम्स के ‘सेंटर फॉर Integrative मेडिसिन एंड रिसर्च’ (CIMR) के प्रमुख डॉ. गौतम शर्मा और मनोरोग विभाग (साइकियाट्री) के प्रोफेसर डॉ. राजेश सागर जैसे चिकित्सा विशेषज्ञ भी शामिल थे। टीम पिछले कई वर्षों से इस बात पर काम कर रही थी कि भारतीय प्राचीन योग विज्ञान को आधुनिक एलोपैथी चिकित्सा के साथ मिलाकर किस तरह असाध्य रोगों के इलाज को आसान और प्रभावी बनाया जा सके। यह अध्ययन चिकित्सा जगत की प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में से एक, अमेरिकन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी के जर्नल ‘न्यूरोलॉजी’ में प्रकाशित हुआ है।
डॉ. मंजरी त्रिपाठी ने इस रिसर्च के पीछे की वजह बताते हुए कहा, “मिर्गी के मरीजों के साथ सबसे बड़ी त्रासदी यह होती है कि वे सिर्फ शारीरिक बीमारी से नहीं जूझते, बल्कि समाज में इस बीमारी को लेकर फैले अंधविश्वास और कलंक (स्टिग्मा) के कारण पल-पल घुटते हैं। अस्थमा, डायबिटीज या सिरदर्द जैसी बीमारियों में मरीज को ऐसी सामाजिक उपेक्षा नहीं झेलनी पड़ती, जैसी मिर्गी में देखने को मिलती है। लोग इसे अक्सर ऊपरी हवा या मानसिक पागलपन समझ लेते हैं। समाज के इसी गलत नजरिए के कारण मरीज गहरी हीन भावना, तनाव और डिप्रेशन में चले जाते हैं। हमारी इस रिसर्च का उद्देश्य सिर्फ दौरों को रोकना नहीं था, बल्कि मरीजों के दिल और दिमाग से उस सामाजिक डर और झिझक को हमेशा के लिए खत्म करना था।”
बीमारी से बड़ा है सामाजिक कलंक का दंश
डॉक्टरों के मुताबिक, मिर्गी एक दिमागी विकार है जिसमें मस्तिष्क की कोशिकाएं अचानक असामान्य विद्युत तरंगें (इलेक्ट्रिकल इंपल्स) पैदा करने लगती हैं, जिससे मरीज का शरीर लड़खड़ा जाता है और उसे दौरे (fits) आते हैं। भारत जैसे देशों में जागरूकता की कमी के कारण मिर्गी का मरीज समाज से कट जाता है। वह स्कूल जाने, नौकरी करने या शादियों-पार्टियों में शामिल होने से कतराने लगता है। डॉक्टरों की भाषा में इसे ‘फेल्ट स्टिग्मा’ (Felt Stigma) यानी बीमारी के कारण भीतर ही भीतर महसूस होने वाली शर्म कहा जाता है। यह मानसिक बोझ इतना खतरनाक होता है कि मरीज तनाव में आकर समय पर दवा लेना भूल जाता है या इलाज ही छोड़ देता है। एम्स की इस रिसर्च ने इसी समस्या का सबसे सटीक समाधान खोजा है।
कैसे की गई यह रिसर्च?
इस शोध को पूरी तरह वैज्ञानिक, निष्पक्ष और सटीक बनाए रखने के लिए डॉक्टरों ने बेहद कड़ा और आधुनिक तरीका अपनाया, जिसे चिकित्सा विज्ञान में ‘रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल’ (RCT) कहा जाता है। अध्ययन में 18 से 60 वर्ष की उम्र के कुल 160 मिर्गी के मरीजों को शामिल किया गया। ये सभी मरीज औसतन हर हफ्ते कम से कम एक बार मिर्गी के दौरे का सामना कर रहे थे और पहले से ही डॉक्टरों द्वारा लिखी गई कम से कम दो एंटी-सीज़र (दौरे रोकने वाली) दवाएं खा रहे थे। इसके बावजूद उनकी बीमारी पूरी तरह काबू में नहीं आ रही थी।
इन 160 मरीजों को लॉटरी सिस्टम के जरिए दो बराबर समूहों (80-80 मरीज) में बांट दिया गया:
- पहला समूह (योग ग्रुप): इस ग्रुप के मरीजों को डॉक्टरों की देखरेख में असली और संरचित ‘योग थेरेपी’ दी गई। इस सत्र में शरीर को ढीला करने वाले व्यायाम, विशेष प्राणायाम (सांस लेने की तकनीक), ध्यान (मेडिटेशन) और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने वाले विचार (पॉजिटिव अफर्मेशन्स) शामिल थे। इसके साथ ही उन्हें बीमारी से जुड़ी सही काउंसिलिंग भी दी गई।
- दूसरा समूह (कंट्रोल ग्रुप): इस ग्रुप के मरीजों को भ्रमित होने से बचाने के लिए ‘शैम योगा’ (Fake/Sham Yoga) कराया गया। इसका मतलब है कि मरीजों को योग जैसे दिखने वाले कुछ शारीरिक आसन तो कराए गए, लेकिन उनमें सांसों की विशेष तकनीक (प्राणायाम) या ध्यान का आंतरिक फोकस शामिल नहीं था।
दोनों ही समूहों के मरीजों पर लगातार 6 महीने तक कड़ी नजर रखी गई, और हर तीसरे और छठे महीने पर उनकी दिमागी और शारीरिक स्थिति की जांच की गई।
रिसर्च के चौंकाने वाले नतीजे: आंकड़ों की जुबानी
जब 6 महीने के बाद अंतिम नतीजे कंप्यूटर पर प्रोसेस किए गए, तो खुद रिसर्च करने वाले डॉक्टर्स हैरान रह गए। योग करने वाले मरीजों के जीवन में जो बदलाव आए, वे किसी वरदान से कम नहीं थे:
- दौरों से पूरी मुक्ति: योग करने वाले मरीजों में दौरों के पूरी तरह से रुक जाने (Complete Seizure Remission) की दर कंट्रोल ग्रुप की तुलना में 7.4 गुना अधिक पाई गई।
- दौरों की आवृत्ति में भारी कमी: जो मरीज पूरी तरह दौरों से मुक्त नहीं भी हुए, उनमें से अधिकांश के दौरों की संख्या पहले के मुकाबले आधी या उससे भी कम (4.11 गुना ज्यादा सुधार) हो गई।
- सामाजिक झिझक का खात्मा: ‘किलीफी स्टिग्मा स्केल’ के जरिए जब मरीजों के मानसिक स्तर को मापा गया, तो योग करने वाले मरीजों के भीतर से यह डर पूरी तरह गायब हो चुका था कि ‘अगर मुझे सबके सामने दौरा पड़ गया तो लोग क्या कहेंगे।’
मानसिक सेहत और जीवन की गुणवत्ता
डॉ. किरणदीप कौर और डॉ. राजेश सागर के अनुसार, इस रिसर्च में योग के पांच अन्य बड़े फायदे भी देखे गए:
- तनाव और घबराहट से आजादी: योग के प्रभाव से मस्तिष्क का ऑटोनोमिक नर्वस सिस्टम संतुलित हुआ, जिससे हर वक्त रहने वाली एंग्जायटी और डिप्रेशन के लक्षणों में भारी कमी आई।
- बेहतर याददाश्त (Cognitive Function): मिर्गी की हैवी दवाओं के कारण अक्सर मरीजों में जो भूलने की बीमारी या सुस्ती देखी जाती है, योग करने वाले मरीजों में वह सुस्ती खत्म हो गई और दिमागी सक्रियता बढ़ गई।
- भावनाओं पर नियंत्रण: ध्यान और प्राणायाम की वजह से मरीज अपने गुस्से और डर पर काबू पाना सीख गए, जिससे शरीर में तनाव पैदा करने वाले ‘कॉर्टिसोल’ हार्मोन का स्तर कम हुआ।
- जीवन की गुणवत्ता में सुधार: कुल मिलाकर, मरीज अब खुद को समाज का एक सक्रिय हिस्सा मानने लगे हैं और काम पर लौटने के लिए उनका आत्मविश्वास वापस आ गया है।
मरीजों के लिए बेहद जरूरी हिदायत
इस बेहद सफल रिसर्च के बाद एम्स के न्यूरोलॉजी विभाग ने मिर्गी के मरीजों के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण गाइडलाइन भी जारी की है। डॉ. मंजरी त्रिपाठी ने साफ शब्दों में आगाह किया है कि योग को मिर्गी की दवाओं के ‘विकल्प’ (रिप्लेसमेंट) के रूप में बिल्कुल न देखा जाए। मरीज यह कतई न सोचें कि योग शुरू करने के बाद वे अपनी दवाएं बंद कर सकते हैं।
यह एक ‘अड-ऑन थेरेपी’ (पूरक चिकित्सा) है। दवाएं अपना काम करती हैं और न्यूरॉन्स की गड़बड़ी को ठीक रखती हैं, जबकि योग शरीर और दिमाग के स्ट्रेस लेवल को इतना कम कर देता है कि दवाएं शरीर पर और ज्यादा तेजी से असर करने लगती हैं। चूंकि तनाव ही मिर्गी के दौरे को ट्रिगर करने वाला सबसे बड़ा कारण है, इसलिए जब योग से तनाव घटता है, तो दवाएं सर्वोत्तम परिणाम देती हैं।
दुनिया के लिए भारत का संदेश: सुलभ और सस्ता इलाज मुमकिन
अध्ययन के सह-लेखकों का मानना है कि भारत जैसे विकासशील देश में, जहां ग्रामीण इलाकों में न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टरों और महंगे इलाज की भारी कमी है, वहां योग एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है। योग के लिए किसी महंगे तामझाम या भारी-भरकम फीस की जरूरत नहीं है। इसे घर पर रहकर भी आसानी से सीखा और किया जा सकता है। एम्स की इस शानदार वैज्ञानिक उपलब्धि ने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया है कि आधुनिक विज्ञान (एलोपैथी) और भारत की प्राचीन योग पद्धति मिलकर मानवता को कितनी बड़ी राहत दे सकते हैं।