एम्स में संगोष्ठी: ‘भोजन दवा है’ को पढ़ाई और इलाज से जोड़ने का आह्वान

देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को एक नई सोच और नई दिशा देने के उद्देश्य से राजधानी के ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स), नई दिल्ली में एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। नीति आयोग के सदस्य डॉ. एम. श्रीनिवास ने देश भर के डॉक्टरों, वैज्ञानिकों और चिकित्सा शिक्षाविदों का आह्वान करते हुए कहा है […]

नीति आयोग के सदस्य डॉ. एम. श्रीनिवास ने बताया कि भारत में तेजी से बदल रही बीमारियों के स्वरूप को देखते हुए अब केवल दवाएं देना काफी नहीं है, बल्कि भविष्य के डॉक्टरों को पोषण, डाइट और स्वस्थ जीवनशैली की बुनियादी शिक्षा देना समय की सबसे बड़ी मांग है।

एम्स नई दिल्ली के फिजियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. राजकुमार यादव संगोष्ठी में विमोचित हुई नई पाठ्यपुस्तक के मुख्य संपादक (लीड एडिटर) के रूप में कार्यक्रम के प्रमुख सूत्रधार रहे, जिन्होंने डॉक्टरों द्वारा नियमित इलाज में दवाओं के साथ पोषण और लाइफस्टाइल काउंसिलिंग को अनिवार्य रूप से शामिल करने की वकालत की।

दवाओं के साथ पोषण जरूरी: नीति आयोग की दूरदर्शी सोच

राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए नीति आयोग के सदस्य डॉ. एम. श्रीनिवास ने कहा कि देश की पोषण संबंधी चुनौतियों का समाधान करने के लिए सभी संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों का एक साथ आना बेहद आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भविष्य के चिकित्सा विशेषज्ञों को तैयार करने और बीमारियों को होने से पहले रोकने वाली प्रिवेंटिव हेल्थकेयर को मजबूत करने के लिए मेडिकल पाठ्यक्रम में बदलाव जरूरी है। उन्होंने सभी हितधारकों से अपील की कि वे मिलकर ऐसे सुझाव दें, जिनसे देश की स्वास्थ्य नीति को अधिक समग्र और व्यावहारिक बनाया जा सके।

💬 नीति आयोग के सदस्य का संदेश:

“वैज्ञानिक साक्ष्य अब इस बात में कोई संदेह नहीं छोड़ते कि भोजन, पोषण और जीवनशैली ही हमारे स्वास्थ्य के सबसे शक्तिशाली निर्धारक हैं। इसके बावजूद हमारे देश में एमबीबीएस स्तर की डॉक्टरी पढ़ाई में इन विषयों को उतना स्थान नहीं मिलता जितने के वे हकदार हैं। अब समय आ गया है कि फिजियोलॉजी, पोषण और लाइफस्टाइल मेडिसिन को आपस में जोड़ा जाए ताकि भावी डॉक्टर यह समझ सकें कि रोजमर्रा का खान-पान मरीज की सेहत पर कितना असर डालता है।”

डॉ. एम. श्रीनिवास, सदस्य, नीति आयोग

नई पाठ्यपुस्तक का विमोचन

संगोष्ठी में ‘न्यूट्रिशन, डाइट एंड लाइफस्टाइल: लर्निंग एंड टीचिंग डाइट, फूड, न्यूट्रिशन एंड लाइफस्टाइल इन क्लिनिकल प्रैक्टिस’ पुस्तक का विमोचन किया गया। यह किताब मेडिकल कॉलेजों में पोषण और जीवनशैली शिक्षा को बढ़ावा देने में एक मील का पत्थर साबित होगी।

इस किताब का संपादन एम्स के प्रोफेसर डॉ. राजकुमार यादव, प्रसिद्ध चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. अलेक्जेंडर थॉमस और फूड फ्यूचर फाउंडेशन के संस्थापक व पूर्व सीईओ (एफएसएसएआई) पवन अग्रवाल ने संयुक्त रूप से किया है। इसके अलावा, इस किताब की सामग्री को वरिष्ठ पोषण विशेषज्ञ परीक्षा राव के नेतृत्व में देश भर के शीर्ष पोषण और लाइफस्टाइल विशेषज्ञों की एक समर्पित टीम ने विकसित किया है।

इस बहुमूल्य किताब का औपचारिक विमोचन मंच पर एम्स नई दिल्ली के निदेशक डॉ. निखिल टंडन, एम्स के एसोसिएट डीन (रिसर्च) डॉ. गोविंद मखारिया और फूड फ्यूचर फाउंडेशन के संस्थापक व पूर्व सीईओ (एफएसएसएआई) पवन अग्रवाल द्वारा संपन्न किया गया।

इलाज में डाइट थेरेपी

संगोष्ठी के दौरान विभिन्न चिकित्सकीय सत्रों में देश के जाने-माने डॉक्टरों और शोधकर्ताओं ने महत्वपूर्ण शोध प्रस्तुत किए। एम्स नई दिल्ली में फिजियोलॉजी विभाग की अध्यक्ष डॉ. रत्ना शर्मा ने कहा कि पोषण विज्ञान और जीवनशैली चिकित्सा में हो रहे नए अनुसंधानों के अनुरूप मेडिकल शिक्षा में बदलाव लाना अत्यंत आवश्यक है।

बच्चों की गंभीर बीमारियों पर केंद्रित सत्र में प्रो. शेफाली गुलाटी और प्रो. वंदना जैन ने अपना विशेष व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि बच्चों में मिर्गी (एपिलेप्सी), ऑटिज्म, बचपन का मोटापा और मेटाबॉलिक गड़बड़ियों के उपचार में विशेष डाइट थेरेपी अत्यंत प्रभावी और मददगार साबित हो रही है।

इसके साथ ही, प्रो. नवल के. विक्रम ने अपने व्याख्यान में कंकाल की मांसपेशियों (स्केलेटल मसल्स) और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य के आपसी संबंधों को विस्तार से समझाया। वहीं डॉ. रितेश नेताम ने अपने शोध पत्र के माध्यम से यह प्रदर्शित किया कि किस तरह अत्यधिक वसायुक्त भोजन (हाई-फैट डाइट) लेने से शरीर में मोटापा और मस्तिष्क में सूजन (न्यूरोइन्फ्लेमेशन) की समस्या उत्पन्न होती है।

बीमारियों के उपचार में पोषण के प्रमुख निष्कर्ष

भोजन में नमक कम करना जरूरी

संगोष्ठी के एक विशेष वैज्ञानिक सत्र में भोजन में स्वाद से समझौता किए बिना नमक (सोडियम) की मात्रा घटाने और खाद्य पदार्थों में सुधार करने के उपायों पर गहन चर्चा हुई।

जापान से आए इंटरनेशनल ग्लूटामेट टेक्निकल कमेटी (IGTC) के अध्यक्ष डॉ. मीरो स्म्रिगा ने अंतरराष्ट्रीय अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि साक्ष्य-आधारित सुधारों से दुनिया के कई देशों में सोडियम की मात्रा घटाकर सार्वजनिक स्वास्थ्य में बड़ा सुधार किया गया है।

सत्र के दौरान प्रो. एच. एन. मल्लिक ने एमएसजी (मोनोसोडियम ग्लूटामेट) के वैज्ञानिक पक्षों पर प्रकाश डाला। वहीं डॉ. त्रिना सेनगुप्ता ने प्रसिद्ध शोध पत्रिका ‘फ्रंटियर्स इन न्यूट्रिशन’ में प्रकाशित हालिया समीक्षा के नतीजे प्रस्तुत किए।

सोडियम में कमी और एमएसजी सुरक्षा रिपोर्ट

  • सोडियम घटाने का सुरक्षित विकल्प: डॉ. मीरो स्म्रिगा और प्रो. एच. एन. मल्लिक के अनुसार एमएसजी का सही और संतुलित उपयोग भोजन में स्वाद बनाए रखते हुए नमक की मात्रा घटाने में मददगार है।
  • अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा समीक्षा: डॉ. त्रिना सेनगुप्ता द्वारा पेश रिपोर्ट के अनुसार एमएसजी सामान्य जनता के साथ-साथ शिशुओं, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए पूरी तरह सुरक्षित पाया गया है।

वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की उपस्थिति

इस राष्ट्रीय सिम्पोजियम में देश के अग्रणी संस्थानों से आए प्रसिद्ध डॉक्टरों, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और आहार विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया और परिचर्चा में सक्रिय योगदान दिया।

कार्यक्रम में एम्स नई दिल्ली के वरिष्ठ संकाय सदस्य प्रो. गिरिजा प्रसाद रथ, प्रो. राजेश खड़गावत, और डॉ. ज्योत्स्ना विशेष रूप से उपस्थित रहे। इनके साथ ही आईसीएमआर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन के वैज्ञानिक ‘जी’ डॉ. सुब्बाराव एमजी, वरिष्ठ आहार विशेषज्ञ अनुजा अगरवाला, आईआईटी गुवाहाटी के प्रो. विमल कटियार, मैसूर विश्वविद्यालय की प्रो. जमुना प्रकाश, दिल्ली विश्वविद्यालय से प्रो. कोमल चौहान, प्रो. सीमा पूरी, व प्रो. इरम एस. राव, तथा लेडी इरविन कॉलेज की प्रो. पुलकित माथुर ने भाग लिया और अपने विचार साझा किए।

भविष्य की राह: पोषण और क्लिनिकल मेडिसिन का संगम

समारोह के अंत में फूड फ्यूचर फाउंडेशन के संस्थापक और सीईओ पवन अग्रवाल ने कहा कि यह राष्ट्रीय संगोष्ठी पोषण विज्ञान और क्लिनिकल मेडिसिन के बीच वर्षों से चली आ रही दूरी को मिटाने की एक बहुत बड़ी और दूरगामी शुरुआत है।

संगोष्ठी का समापन इस निष्कर्ष के साथ हुआ कि भारत में एक मरीज-केंद्रित, प्रिवेंटिव और वेलनेस-आधारित स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का निर्माण करने के लिए मेडिकल कॉलेजों के पाठ्यक्रम में न्यूट्रिशन और लाइफस्टाइल मेडिसिन को मजबूत करना सबसे आवश्यक कदम है।