दंपत्ति और दाम्पत्य जीवन : संचित कर्मों का लेखा-जोखा
दांपत्य जीवन महज दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि जन्मों-जन्मों के संचित कर्मों और ऋणों का एक अनूठा संगम है। यह रिश्ता कभी परीक्षा तो कभी तपस्या की भांति होता है, जिसे केवल प्रेम, समर्पण और विश्वास की डोर से ही सुलझाया जा सकता है। इस गहन सत्य को जीवंत करता, दिल्ली के प्रसिद्ध गंगाराम […]
दांपत्य जीवन महज दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि जन्मों-जन्मों के संचित कर्मों और ऋणों का एक अनूठा संगम है। यह रिश्ता कभी परीक्षा तो कभी तपस्या की भांति होता है, जिसे केवल प्रेम, समर्पण और विश्वास की डोर से ही सुलझाया जा सकता है। इस गहन सत्य को जीवंत करता, दिल्ली के प्रसिद्ध गंगाराम अस्पताल में बेहोशी (एनेस्थिसिया) के डॉक्टर का भुवन चंद्र पाण्डेय का लेख।
धैरहं पृथिवीत्वम्। रेतोऽहं रेतोभृत्त्वम्। मनोऽहमस्मि वाक्त्वम्। सामाहमस्मि ऋकृत्वम्। सा मां अनुव्रता भव। बृहदारण्यक उपनिषद्
मैं आकाश हूँ और तुम पृथ्वी हो। मैं जीवन ऊर्जा का दाता हूँ और तुम इसे धारण करने वाली हो। मैं विचार हूँ और तुम वाणी हो। मैं संगीत हूँ और तुम गीत हो। तुम मेरे सहगामी बनो, ताकि हम दोनों मिलकर सृष्टि के चक्र को आगे बढ़ा सकें।
मूल भाव यह है कि जैसे प्रकृति और पुरुष एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं, वैसे ही दांपत्य जीवन में विचारों और भावनाओं के मिलन से ही एक आदर्श जीवन संभव होता है।
पति-पत्नी पर लिखे पिछले लेख को जब मैने बहुत से साथियों व सह-कर्मियों को दिखाया तो सभी कहने लगे कि अपने पति या पत्नी को जरूर दिखाएंगे। उनके विचार में अधिकतर परेशानियों या मन की गांठों का कारण उनके जीवन साथी की मनोवृत्ति या कार्य प्रणाली है। एक मजेदार बात यह भी थी कि अधिकतर महिलाओं व पुरुषों को ऐसा लगता है कि उनका विवाह वर्तमान में हुए इस सम्बन्ध से ज्यादा अच्छा हो सकता था, इस बात को लेकर कई लोगों के मन में एक खटका सा महसूस हुआ।
आज यह लेख लिखने की आवश्यकता इसलिए महसूस हुई कि अपने विवाह को लेकर कोई शंका ना रह जाये और पूर्ण समर्पित हृदय से इस सम्बन्ध को हम निभा पाएं। जब भी दो व्यक्ति एक दूसरे से प्रेम, त्याग, करुणा व समर्पण का भाव रखते हैं तो वे एक अदृश्य डोर से बंध जाते हैं। हमारे उत्तम दृष्टांत, उत्कृष्ट ग्रंथों एवं गहरे चिंतन से यह बात सिद्ध हो जाती है कि जो मिला है-जैसा भी मिला है वो हमारे प्रारब्ध से ही मिला है और इसलिए उसी में संतुष्ट रहना चाहिए।
राजा जनक के गुरु अष्टावक्र के द्वारा लिखी गीता के अनुसार ‘सभी को अपना ऋण चुकाना ही होता है’। इसका अर्थ है पुराने कई जन्मों के संचित कर्म, लेन-देन का हिसाब, अपूर्ण अपेक्षाएं-कामनाएं व प्रेम, इन सभी से ऊपर उठने व पुराने ऋणों के भुगतान के लिए ही हम मिलते हैं। दंपत्ति बनने का यह सम्बन्ध अपने रिश्ते को बढ़ाने का व ऋणों को चुकाने का होता है। यहाँ जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव व कठिन परिस्थितियाँ, इस रिश्ते की परीक्षा लेते रहते हैं। यह एक ऐसा अनूठा मिलन है जो समय एवं मृत्यु की सीमाओं से परे है।
इस युगल यात्रा में कभी-कभी चिड़चिड़ापन व कभी क्रोध आना भी स्वाभाविक है, पर यदि तराजू के दो पलड़ों के समान जब भी किसी का पलड़ा क्रोध रूपी दानव से भारी होकर नीचे आ जाए तो दूसरे पलड़े को सहनशीलता व समझदारी के साथ हल्का हो जाना चाहिए, नहीं तो यह रिश्ता बहुत डगमगा जाता है। यह आपसी कड़वाहट और रिश्तों में खटास कभी कुछ क्षण के लिए कभी लम्बे समय के लिए और कभी तो हमेशा के लिए बनी रहती है। अगर किसी के यहां सही अर्थों में शांति और सुकून है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके यहां परेशानियां नहीं हैं बल्कि इसका अर्थ यह है कि वे दोनों परेशानियों की उलझी गांठों को खोलकर सुलझा चुके हैं और ऊपर उठकर सोच रहे हैं।
ऐसा प्रयास करना चाहिए कि किसी और के जीवन-साथी के साथ अपने जीवन साथी की तुलना ना करें, नहीं तो आधी-अधूरी बात मन में रहेंगी और उसकी अच्छाई भी नहीं दिखेगी जिससे मन में गांठे ही लगेंगी और आपसी उलझन बढ़ेगी, तुलना करनी हो तो ऐसे कार्य की जिससे दोनों का उत्थान हो। दोनों में विश्वास और समर्पण इतना गहरा हो कि लेशमात्र भी शंका ना रहे, क्यूंकि मन के कोटर में या तो विश्वास रहता है या फिर शंका, जिस द्वार से शंका का प्रवेश मन में होता है उसी द्वार से विश्वास बाहर चला जाता है।
पति-पत्नी का रिश्ता तो बड़ा ही सुन्दर व प्रेममयी होता है जिसमे कुछ खट्टा-मीठा-नमकीन तड़का भी लगता रहता है। नोक-झोंक, छेड़-छाड़ व टीका-टिप्पणी भी साथ-साथ चलती रहती है, कुल मिलाकर अर्थ यह है कि सब प्रकार के रस इसमें निहित होते हैं। प्रथम कुछ वर्षों में प्रेम व सुख की बातें, फिर परिवार की चहुमुखी जिम्मेदारी, जिसके बाद फिर अंत में केवल वे दोनों ही रह जाते हैं। अगर दोनों में से कोई पहले संसार को विदा कह देता है तो दूसरे को बहुत समय लगता है इस बिछोह के दुःख से उबरने में और सामान्य हो पाने में। चिंतन की बात यह है कि जीवन यात्रा का यह चलचित्र रूपी संस्मरण निरंतर चलता रहता है-जब भगवान के अवतार भी अपनी लीला करके चले गए और फिर भी यह संसार उसी प्रकार चल रहा है तो फिर हमारी क्या बिसात। जरुरत है तो इस जीवन यात्रा के उद्देश्य को जानने की और एक दूसरे के उत्थान की।
एक सुंदर दृष्टांत के द्वारा यह बात साफ हो जाती है कि हमारा सम्बन्ध अनेको जन्मों का होता है: एक वृद्ध पति-पत्नी जो की सुख से जीवन व्यतीत कर रहे थे, उनके मन में एक प्रश्न उठा और अपने इस प्रश्न के उत्तर को खोजते-खोजते वे हिमालय के दुर्गम पहाड़ों व अनेकों मुश्किल राहों से होते हुए एक छोटे से आश्रम में पहुंचे। यहाँ एक बाबा ध्यान लगाए बैठे थे, कुछ देर बाद उन्होंने आँख खोली और मुस्कुराकर पूछा ‘बोलो किस शंका समाधान के लिए यहां पर आये हो?”, वृद्ध दंपत्ति ने बड़ी विनम्रता से बाबाजी से प्रश्न पूछा “हम अपना जीवन यापन सुख से कर रहे हैं पर मन में उठी एक जिज्ञासा को शांत करने के लिए हम यहाँ पर आये हैं कि ‘क्या हम पिछले जन्म में मिल चुके हैं’?” बाबाजी ने कहा ठीक है तुम्हारी शंका का समाधान निश्चित ही हो जाएगा, फिर उन्होंने कहा कि कुछ दूरी पर स्थित उस गुफा को पार कर लेना जिसके अंत में नीचे की तरफ एक तालाब है। उस तालाब के समीप जाकर बैठ जाना एक दूसरे की आंखों में देखना और फिर स्वच्छ पानी में अपनी परछाई को देखना, तुम्हे स्वतः ही सब ज्ञात हो जायेगा।
उन्होंने वैसे ही किया उस अंधेरी गुफा से होते हुए जब वह अंत में पहुंचे तो गुफा खुली हुई थी। ऊपर नीला आकाश और नीचे एक स्वच्छ पानी का तालाब था। दोनों ने मुस्कुरा कर एक दूसरे को देखा और फिर जल में अपनी परछाई देखने लगे, धीरे-धीरे हिलता हुआ पानी शांत हो गया और उनका प्रतिबिम्ब साफ दिखने लगा। उन्हे अपने पिछले जन्मों के जीवन को उस जल में एक चलचित्र की भांति देखा। पिछले जन्म में वह पति-पत्नी ही थे, उससे पिछले जन्म में किसी और रिश्ते में बंधे थे-कभी वह मित्र थे, कभी रिश्तेदार, कभी माता-पुत्र कभी पिता-पुत्री और कभी कोई और सम्बन्ध। अनेक छोटे-बड़े सम्बंधों का यह बंधन कई जन्मों से चलता आ रहा है। जब उन्होंने अपने अनेकों जन्मों को चलचित्र के रूप में अपनी आंखों से देखा तो दोनों ही कुछ देर में आनंद से भर गये और तृप्त मन से वहां से चल दिए।
वापस आने पर बाबा जी ने कहा क्यों, क्या तुम्हे और जन्मों का लेखा-जोखा नहीं देखना है अभी तो लगभग 10 जीवन ही देखे हैं। उन्होंने कहा अब हम तृप्त हुए, और अब हमें जीवन का सारा सार समझ में आ गया है। हम इस जन्म में भले पति-पत्नी हो लेकिन अनेकों जन्मों से हम एक दूसरे के ऋणो और अपेक्षाओं को पूरा करते आये हैं पर हमने देखा कि हर बार कोई ना कोई बात या अपेक्षा, हृदय में रह जाती है और फिर लेन-देन का यह सिलसिला यूँ ही चलता रहता हैं। अब हम कोशिश करेंगे कि इस जीवन में सारी अपेक्षाएं, ऋण व लेन-देन पूरा कर लें, जिससे कि मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो जाये।
अलग-अलग देश-काल-परिस्थिति में अलग सोच के साथ हुए चिंतन, इस पावन सम्बन्ध को नये आयामों से जोड़ देतें हैं और एक नयी दिशा प्रदान करते हैं। एक चिंतन के अनुसार पति-पत्नी का पावन सम्बन्ध जल की तीन अवस्थाओं के जैसे होता है। पहला – जिसमे दोनों बर्फ की तरह कठोर होकर एक दूसरे को कष्ट देतें हैं व अपनी कठोरता से चोट पहुंचा कर नुकसान पहुँचाते रहते है। दूसरा-जल की तरह द्रव रूप में रहकर अपने रूप रंग को बदलकर उस परिस्थिति के अनुसार ढल जाते हैं। तीसरा-भाप जैसा बनकर सारा अहंकार, अभिमान व अपने को पूर्ण रूप से रूपातंरित कर एक दूसरे में विलय हो जाते हैं कि अलग देखना ही असंभव हो जाता है।
अनेक स्थानों पर कहा गया है ये पावन सम्बन्ध वैसा ही है जिस प्रकार हमारे वस्त्र, हमारे शरीर के समीप रहकर हमें बाहरी वातावरण से रक्षा करते हैं उसी प्रकार हमारा जीवन साथी भी समीप रहकर हमारी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक व सामाजिक रूप से हमारी रक्षा करता है। ऐसा भी कहा गया है कि जिस प्रकार सुन्दर वस्त्र आकर्षक लगते हैं उसी प्रकार एक अच्छा जीवन-साथी हमारे जीवन को गरिमामय, शान्तिमय व सुकून की अनुभूति कराता है जिससे जीवन यात्रा सुंदर बनती है।
एक बात जो गहरी है और शास्त्र सम्मत भी, कोई माने या ना माने पर सीधा सा गणित है कि कर्मों का फल किसी को नहीं छोड़ता, यह जन्मानतरों तक ऐसे ही चलता रहता है। इनसे तभी छूटा जा सकता है जब ऋण मुक्त हो जाते हैं, यानि कि सारा का सारा लेन-देन शून्य हो जाता है। एक युवा राजकुमार के विवाह के बाद जब उसकी बहू ने सोते हुए राजकुमार की चमकती हुई तलवार को देखा तो उसे तलवार बड़ी पसंद आई, उसने म्यान से तलवार को निकाल लिया और उसे घुमाने लगी तभी तलवार उसके हाथों से फिसल कर राजकुमार के गले में जा पड़ी और तत्काल ही राजकुमार की मृत्यु हो गई। घबराकर उसने सारा दोष अपने राजपुरोहित के ऊपर मढ़ दिया।
राजपुरोहित जो कि एक सम्माननीय और ज्ञानी व्यक्ति थे, पर परिस्थितियों के कारण सारा दोष उन पर साबित हो गया और उन्हें हत्यारा साबित कर दिया गया। हालांकि राजा को यह बात पता थी कि वे निर्दोष हैं पर उनके पक्ष में सबूत का अभाव था जिससे उनको सजा मिलनी तय हो गयी। राजा ने सजा के तौर पर उनका एक हाथ कोहनी से कटवा दिया। पुरोहित इस बात से बहुत व्यथित व परेशान थे, उन्होंने वह राज्य छोड़ दिया और अब इस प्रश्न की तलाश में थे कि उनके साथ ऐसा क्यों हुआ जबकि उनकी कोई गलती भी नहीं थी। अब उनके जीवन का उद्देश्य था इस प्रश्न का उत्तर पता करना, गांव-गाँव व नगर-नगर घूमते-घूमते वे अंततः ज्ञान की भूमि काशी पहुंचे, वहां एक पंडित जी जो कि एक ज्ञानी व्यक्ति थे, उनका पता कर उनके घर के पास पहुंचे।
घर में पूछने पर पता लगा कि वह अभी कहीं बाहर गए हैं और संध्या समय तक ही वापस आएंगे। उन ज्ञानी पुरुष की पत्नी लगातार यह बात बोले जा रही थी कि वे घर का कोई काम नहीं करते हैं और मुझे उनसे कोई सहायता नहीं मिलती है। पूरे दिन वह लगातार अपने पति को कोसे जा रही थी और बड़बड़ा रही थी। संध्या समय जब पंडितजी वापस घर पधारे तो उन्होंने पुरोहित जी का उचित सत्कार किया और वहां आने का कारण पूछा, पुरोहित जी ने बड़े दुखी मन से कहा कि मेरे साथ ऐसा हुआ जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी, मैंने तो कोई पाप नहीं किया ना किसी को परेशान किया फिर मेरे साथ ऐसी घटना क्यों हुई?
पंडित जी ने शांत भाव से बताया की पिछले जन्म में तुम एक साधु थे और नदी किनारे साधना कर रहे थे, तभी एक गाय भागती हुई आई और तुम्हारे सामने से होते हुए दूसरे रास्ते में चली गई उसके पीछे-पीछे सिंह आया, जब उसने गाय का पता पूछा तब तुमने कोहनी से इशारा करके गाय की दिशा बताई, जिस कारण इस जन्म में तुम्हें इस परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। पुरोहित जी इस बात से संतुष्ट होकर जाने लगे तभी उनके मन में एक प्रश्न आया कि पंडित जी मेरी बात तो ठीक है लेकिन आप इतने शांत स्वभाव के हैं और आपकी पत्नी इतनी कटु स्वभाव की एवं अनर्गल अलाप करने वाली है इसका कारण क्या है?
पंडित जी ने लंबी सांस लेते हुए कहा पिछले जन्म में मैं एक कौवा था और मेरी पत्नी एक गधी थी। एक बार उसकी पीठ में घाव हो गया और उसमें मवाद भर गया जिससे उसे बहुत पीड़ा होती, लेकिन मुझे उसके घाव में चोंच मार कर बड़ा मजा आता था। एक दिन उसने बचने के लिए तेजी से दौड लगायी तो लडखडा कर वह गंगाजी में गिर पड़ी और मैं भी उसके नीचे दबकर मर गया। गंगा जी में शरीर त्यागने के कारण हमें मानव जीवन मिला। लेकिन मैने उसे जितना चोंच मारकर परेशान किया था आज वही घाव वह मुझे दे रही है। पुरोहित जी ने कहा लेकिन आप कुछ कहते भी तो नहीं हैं, मुस्कुराकर पंडितजी नें कहा जब तक मेरा ऋण पूरा नही हो जाता ऐसे ही चलेगा, अगर मैने फिर चोंच मारी तो अगले जन्म में फिर यही ऋण किसी और रूप में वापस करना पड़ेगा। इसलिए अपने प्रारब्ध को तो भुगतना ही पड़ेगा। पुरोहित जी स्तब्ध से खड़े रह गए, कर्म फल के सिद्धांत का सारा खेल समझ कर उनके ज्ञान चक्षु खुल गए, फिर उन्हें ना किसी से कोई शिकायत थी ना ही कोई ग्लानि।
ज्ञानियों की इस पावन धरा में विद्यमान लोगों की एक और पावन सोच के अनुसार पति-पत्नी का संबंध ऐसा भी मान सकते हैं जैसे कि हमारे दोनों पैर, जिस प्रकार आगे बढ़ने के लिए चलना जरूरी है और चलने के लिए दोनों पैरों का सामंजस्य। इस प्रकार संतुलन तभी होगा जब दोनों पैर समान रूप से शरीर का भार उठाएंगे, एक पैर आगे बढ़ता है तो दूसरा उसे संतुलित करने के लिए पीछे आ जाता है। दोनों में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि दोनों ही एक दूसरे के पूरक है एक आगे आया तो एक पीछे, जब पीछे वाले की आवश्यकता होगी तब पिछला पैर भी आगे आ जायेगा और अपना कार्य करेगा। इसी प्रकार जीवन की गाड़ी आगे बढ़ती रहेगी बिना किसी एक को तकलीफ पहुंचाए या ज्यादा भार डाले। किसी भी पैर को अकड़ में रहने की जरुरत नहीं है क्यूंकि आगे रहने वाला पैर इसलिए आगे आ रहा है जब पीछे वाला संतुलित रहकर मजबूती प्रदान कर रहा है।
इस रिश्ते की यात्रा बहुत सरल तो नहीं है पर बिना कठिन कार्य किये ऊँचाईयों को नहीं पाया जा सकता है ये वैसे ही है जैसे कालजयी कविता के रचयिता श्री जय शंकर प्रसाद जी के लिखें ये शब्द :
वह पथ क्या, पथिक कुशलता क्या, जिस पथ पर बिखरे शूल न हों। नाविक की धैर्य परीक्षा क्या, जब धाराएँ प्रतिकूल न हों।
इसका पूरा भाव यह है कि असली यात्री और नाविक की पहचान तभी होती है, जब रास्ते में मुश्किलें हों और हालात विपरीत हों।
इस सम्बन्ध की भव्यता-दिव्यता वैसी ही है जैसे एक मंदिर में विद्यमान सुन्दर प्रतिष्ठित मूर्ति। एक भव्य मूर्ति बनाने के लिए अनेको बार छेनी-हथोड़े से खट-खट पट-पट की जाती है, यानि की अनेकों चोट खाकर ही एक उबड़-खाबड़ पत्थर से सुन्दर आकृति वाली मूर्ति ऊकेरी जाती है। हमारा यह अनूठा सम्बन्ध भी ऐसा ही है जिसमे अनेकों बार नोक-झोंक, क्रोध, आक्रामकता, अपेक्षाओं का अपूर्ण रहना, आरोप-प्रत्यारोप, झुंझलाहट, उतार चढ़ाव, परेशानियों व आलोचनाओं के छेनी-हथोड़े चलते ही रहते हैं। पर सुंदरता तभी आती है जब समर्पित मन से निरंतर अभिषेक व प्रेम से भरे भावों की समिधा से यज्ञ किया जाता है, एक दूसरे की कमियों को समझने व उसे पूर्णतया स्वीकार करने के बाद रिश्ते में प्रगाढ़ प्रेम व आनंद का संचार होता है और धीरे धीरे यह रिश्ता एक मधुर रूप ले लेता है। एक अच्छा जीवनसाथी कभी एक दूसरे की कमियां नहीं दिखाता और ना ही एक दूसरे को नीचा दिखाता है बल्कि एक दूसरे के स्वाभिमान का सम्मान करते हैं।
दंपत्ति के इस भव्य-दिव्य सम्बन्ध जैसा कोई और सम्बन्ध नहीं होता, पूर्ण समर्पण के साथ-साथ शायद ये सबसे अधिक अवधि का रिश्ता है। ये अद्भुत सम्बन्ध व उनकी आपसी परस्पर क्रिया वैसी ही है जैसी समष्टि और व्यष्टि का निरंतर चलता यह खेल। यहाँ अगर ऊँची सोच रखी तो उत्थान भी है और एक दूसरे की कमियां देखें तो पतन भी। अपेक्षाओं व कमियों से ऊपर उठकर अगर चिंतन किया जाए तो एक दूसरे के पूरक बनकर अर्धनारीश्वर स्वरुप तक पहुँचना असंभव नहीं होगा। एक दूसरे को सहर्ष स्वीकार करना, नापसंद आने वाली छोटी-छोटी बातों को अनदेखा करना, अपनी उग्रता व अहं को उसी भांति नीचे दबा के रखना चाहिए जैसे देवों के देव महादेव के नीचे बिछा हुआ बाघ की खाल का आसन। एक दूसरे के उत्थान के लिए सतत कार्य करना व एक अकम्पित लौ के जैसे अडिग रह कर समर्पित हो जाना ही वो कुंजी है जिससे दोनों का कल्याण निश्चित है।
‘शब्द तो चुभ सकते हैं पर मौन चुभने लगे तो सावधान हो जाने की जरुरत है’

लेखक डॉ. भुवन चंद्र पाण्डेय, दिल्ली के प्रसिद्ध गंगाराम अस्पताल में बेहोशी (एनेस्थिसिया) के डॉक्टर हैं। ऑपरेशन टेबल पर मरीजों को रिलैक्स करने में उन्हें महारत हासिल है।
- उपनिषद
- कर्म
- पति पत्नी
- वेद