एम्स दिल्ली में 70 वर्षीय डोनर की दोनों किडनियां एक ही मरीज में सफलता से ट्रांसप्लांट
आर्मी हेलिकॉप्टर से चंडीगढ़ से लाई गईं थीं किडनियां; लगभग 12 घंटे के लंबे सफर और चुनौतीपूर्ण सर्जरी के बाद महज 10 दिन में स्वस्थ होकर घर लौटीं मरीज. दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ने अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक बार फिर बड़ा इतिहास रच दिया है। एम्स के सर्जरी विभाग के प्रोफेसर […]
आर्मी हेलिकॉप्टर से चंडीगढ़ से लाई गईं थीं किडनियां; लगभग 12 घंटे के लंबे सफर और चुनौतीपूर्ण सर्जरी के बाद महज 10 दिन में स्वस्थ होकर घर लौटीं मरीज.
दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ने अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक बार फिर बड़ा इतिहास रच दिया है। एम्स के सर्जरी विभाग के प्रोफेसर आसुरी कृष्णा के नेतृत्व में डॉक्टरों की एक विशेष टीम ने चिकित्सा जगत में एक और बड़ी मिसाल पेश करते हुए एक ही मरीज के शरीर में दो-दो किडनियों का सफल ट्रांसप्लांट कर दिखाया है। एम्स में इस तरह का यह दूसरा सफल मामला है, जिसने देश में ऑर्गन ट्रांसप्लांट की संभावनाओं को एक नया आयाम दिया है। इस चुनौतीपूर्ण सर्जरी को अंजाम देने वाली मुख्य टीम में डॉ. सुशांत, डॉ. आदित्य बक्शी, डॉ. बृजेश कुमार सिंह और डॉ. मोहित संगाड़े शामिल थे।
चंडीगढ़ से कैसे शुरू हुआ यह पूरा सफर?
यह महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक मेडिकल घटना 28 जुलाई 2026 की है। अंग दान करने वाली डोनर 70 साल की एक बुजुर्ग महिला थीं, जो चंडीमंदिर (चंडीगढ़) के कमांड अस्पताल से थीं। उनकी उम्र अधिक होने और अन्य मार्जिनल विशेषताओं के कारण डॉक्टरों के सामने एक अलग चुनौती थी। ऐसे में एम्स के डॉक्टरों ने एक बेहद सूझबूझ और बुद्धिमत्ता भरी रणनीति अपनाई। यह तय किया गया कि दोनों किडनियों को बेकार जाने देने या अस्वीकार करने के बजाय, एक ही मरीज में ट्रांसप्लांट किया जाए, ताकि उपलब्ध डोनर अंगों का पूरा और बेहतरीन इस्तेमाल सुनिश्चित हो सके।
आर्मी हेलिकॉप्टर का सफर, 12 घंटे की चुनौती
चंडीगढ़ से नई दिल्ली तक अंगों को सुरक्षित और तेज गति से पहुंचाना अपने आप में एक बड़ा टास्क था। इसके लिए आर्मी हेलिकॉप्टर की मदद ली गई, जिससे अंगों का तेजी और सुरक्षा के साथ ट्रांसफर संभव हो सका। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान अंगों का कोल्ड इस्केमिया समय लगभग 12 घंटे तक रहा। इतनी लंबी समयावधि और चुनौतियों के बावजूद, जैसे ही ट्रांसप्लांट पूरा हुआ, दोनों किडनियों ने तुरंत सामान्य रूप से काम करना शुरू कर दिया, जो चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बेहतरीन और असाधारण परिणाम था।
56 साल की महिला को मिला नया जीवन
इस जटिल ट्रांसप्लांट प्रक्रिया में किडनी पाने वाली मरीज 56 साल की एक महिला थीं। डॉक्टरों ने बेहद बारीकी से सर्जरी करते हुए दोनों किडनियों को मरीज के शरीर के दाईं तरफ सफलता पूर्वक प्रत्यारोपित कर दिया। मरीज की रिकवरी बेहद सामान्य और संतोषजनक रही। डॉक्टरों की लगातार निगरानी और बेहतरीन देखभाल के चलते, सर्जरी के ठीक 10 दिन बाद नॉर्मल किडनी फंक्शन के साथ उन्हें अस्पताल से पूरी तरह स्वस्थ होकर डिस्चार्ज कर दिया गया।
अंगदान के दायरे को बढ़ाने की दिशा में एक बड़ी छलांग
मेडिकल विशेषज्ञों के अनुसार, अधिक उम्र या कुछ मार्जिनल विशेषताओं वाले डोनर्स से मिलने वाली किडनियों को अक्सर कई मेडिकल वजहों से अस्वीकार कर दिया जाता है। ऐसे में, दोनों किडनियों को एक ही मरीज में ट्रांसप्लांट करने की यह तकनीक डोनर अंगों के इस्तेमाल को बढ़ाने का एक क्रांतिकारी तरीका है। इस सफल उपलब्धि से क्रोनिक किडनी रोग या एंड-स्टेज किडनी डिजीज से पीड़ित अनगिनत मरीजों के लिए जीवन बचाने वाले ट्रांसप्लांट की उम्मीदें और अधिक मजबूत हो गई हैं। यह उपलब्धि एम्स नई दिल्ली की उस निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाती है, जिसके तहत वह उन्नत ट्रांसप्लांट देखभाल प्रदान करने और अंग उपयोग को अधिकतम करने के लिए लगातार कार्यरत है।
टीम जिसने मिलकर किया यह कमाल?
यह ऐतिहासिक ट्रांसप्लांट सर्जरी एम्स के कई प्रमुख विभागों और देश के अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों के बीच आपसी तालमेल और बेहतरीन टीम वर्क का परिणाम है:
- अन्य सहयोगी विभाग: इस पूरी प्रक्रिया में ट्रांसप्लांट इम्यूनोलॉजी विभाग और अंग रीट्रिवल बैंकिंग संगठन की टीमों ने भी पूरी मुस्तैदी से काम किया।
- सर्जरी विभाग : सर्जरी का नेतृत्व प्रोफेसर आसुरी कृष्णा ने किया, जिसमें डॉ. सुशांत, डॉ. आदित्य बक्शी, डॉ. बृजेश कुमार सिंह और डॉ. मोहित संगाड़े ने अहम भूमिका निभाई।
- नेफ्रोलॉजी विभाग : इस टीम में प्रोफेसर भौमिक, प्रोफेसर महाजन और डॉ. सचिन शामिल रहे, जिन्होंने मरीज की शुरुआती जांच, सर्जरी से पहले की तैयारी और ऑपरेशन के बाद की देखभाल की कमान संभाली।
- एनेस्थीसिया विभाग : विभाग की प्रमुख प्रोफेसर विमी रेवारी के नेतृत्व में डॉ. हेना ने सर्जरी के दौरान क्रिटिकल केयर और एनेस्थीसिया संबंधी संपूर्ण सहायता प्रदान केली।
इस पूरे अभियान को सफल जमीन देने के पीछे कई लोगों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस कार्य में आर्मी रिसर्च एंड रेफरल हॉस्पिटल, नई दिल्ली का बहुमूल्य सहयोग प्राप्त हुआ और एम्स नई दिल्ली के निदेशक प्रोफेसर निखिल टंडन का निरंतर मार्गदर्शन इस सफलता के पीछे एक बड़ी ताकत रहा। इसके साथ ही, अंगों के रीट्रिवल, हेलिकॉप्टर द्वारा परिवहन और विभिन्न टीमों के बीच संवाद को बिना किसी रुकावट के चलाने में ORBO के ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर बलराम ने मुख्य और बेहद सराहनीय भूमिका निभाई।
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