छात्रों के सुरक्षित आवास की जिम्मेदारी से विश्वविद्यालय दूर क्यों?

सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत गिरने से सात लोगों की मौत ने छात्र आवास की बदहाल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या और हॉस्टल की क्षमता के बीच भारी अंतर है, जिसके कारण हजारों छात्र निजी पीजी यानी पेइंग गेस्ट आवासों में रहने को मजबूर हैं। […]

सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत गिरने से सात लोगों की मौत ने छात्र आवास की बदहाल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या और हॉस्टल की क्षमता के बीच भारी अंतर है, जिसके कारण हजारों छात्र निजी पीजी यानी पेइंग गेस्ट आवासों में रहने को मजबूर हैं। युवा लेखक आदित्य़ लाठर ने इस लेख में छात्रों की मजबूरी से जुड़ा ज्वलंत मुद्दा उठाया है कि ये हादसा सिर्फ अवैध निर्माण या बिल्डिंग नियमों के उल्लंघन का नहीं, बल्कि छात्रों के सुरक्षित आवास की जिम्मेदारी से विश्वविद्यालयों के अलग रहने का भी है।

दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में करीब 50 साल पुरानी पांच मंजिला इमारत का ढहना सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं है। इस इमारत में रिनोवेशन का काम हो रहा था। ये इलाके के सैकड़ों पेइंग गेस्ट यानी पीजी में से एक था। इस दुखद हादसे में सात लोगों की मौत हुई। 12 लोगों को मलबे से जिंदा रेस्क्यू किया गया।

आरोप है कि इमारत तय नियमों का उल्लंघन कर पांच मंजिला बना दी गई थी। साथ ही बेसमेंट में इसके स्ट्रक्चर में कुछ छेड़छाड़ हो रही थी, जिससे इमारत ढह गई। हमेशा की तरह हादसे की जांच हो रही है। निश्चित तौर पर जांच के नतीजों पर कानून अपना काम करेगा। यदि बिल्डिंग लॉज का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारी तय की ही जानी चाहिए।

लेकिन ये घटना इससे कहीं ज्यादा गंभीर है। हम सिर्फ इस सवाल के इर्द-गिर्द नहीं रुक सकते कि इमारत क्यों ढही। यहां ये ज्यादा गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि आखिर माचिस के डिब्बे जैसी जगह में रहने को छात्र मजबूर क्यों हुए।

छात्र लाखों में, हॉस्टल सिर्फ कुछ हजार

दिल्ली विश्वविद्यालय की 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि यहां रेगुलर कोर्सेज में 2,10,907 स्नातक, 34,520 स्नातकोत्तर और शोध छात्र रजिस्टर्ड थे। सर्टिफिकेट और डिप्लोमा कोर्सेज को शामिल करने पर पारंपरिक माध्यम से पढ़ाई करने वाले छात्रों की कुल संख्या 2.5 लाख से अधिक हो जाती है।

रिपोर्ट के आंकड़े ये भी बताते हैं कि इनमें आधे से अधिक छात्र दूसरे राज्यों से आते हैं। विश्वविद्यालय की हॉस्टल की क्षमता लगभग 9,000 बिस्तरों की है। इसका मतलब है कि शिक्षा की चाह में बड़ी संख्या में छात्रों के लिए परिसर से बाहर रहना उच्च शिक्षा हासिल करने की अनिवार्य शर्त है।

पीजी में रहना छात्रों की बड़ी मजूबरी

यहीं से सत्य निकेतन की कहानी शुरू होती है। विश्वविद्यालय के छात्रावास में जगह नहीं मिलने के बाद साउथ कैंपस में छात्र सत्य निकेतन, जबकि नॉर्थ कैंपस में छात्र कमला नगर, विजय नगर और मुखर्जी नगर आदि इलाकों में पीजी में रहने की व्यवस्था कर लेते हैं।

यूनिवर्सिटी के विस्तार के साथ पीजी का बाजार भी बना और तेजी से बढ़ा। कुछ कॉलेजों के अपने छात्रावास हैं, लेकिन कई अन्य के पास परिसर में रहने की सुविधा नहीं है। इसलिए खासकर साउथ कैंपस के आसपास स्थित विभिन्न कॉलेजों के छात्रों का सत्य निकेतन जैसे इलाकों में रहना सामान्य बात है।

यहां एक बुनियादी नीतिगत विफलता स्पष्ट दिखाई देती है। विश्वविद्यालयों के पास प्रवेश, पाठ्यक्रम और परीक्षाओं की योजनाएं होती हैं, लेकिन छात्र कहां रहेंगे, यह सवाल अक्सर परिसर के बाहर की दुनिया पर छोड़ दिया जाता है।

नतीजतन बाजार इस खाली जगह को भर देता है। पुराने मकानों को ‘पेइंग गेस्ट’ आवास में बदला जाता है। छोटे-छोटे डिब्बे जैसे कमरे बनाए जाते हैं। सीमित जगह में अधिक से अधिक छात्रों को ठूंस दिया जाता है।

जब यह प्रक्रिया भवन मानकों, फायर सेफ्टी और संरचनात्मक मजबूती के पर्याप्त निरीक्षण के बिना चलती है, तो अवैध निर्माण’ महज कानूनी मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि एक सामाजिक परिणाम बन जाता है।

पहले हुए ऐसे हादसों से क्या सबक लिया?

दिल्ली में पहले भी ऐसे हादसे हुए हैं। 2022 में इसी सत्य निकेतन इलाके में एक इमारत ढहने से दो लोगों की मौत हुई थी। 2023 में मुखर्जी नगर में महिलाओं के लिए एक पीजी में आग लग गई थी। 2024 में ओल्ड राजिंदर नगर में एक कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में पानी भरने से सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे तीन छात्रों की जान चली गई।

हर बार पुलिस ने केस दर्ज किया। गिरफ्तारियां हुईं। निरीक्षण और सीलिंग अभियान भी चले। खूब सियासी बयानबाजी भी हुई। लेकिन हर घटना में सिर्फ इसी तरह की रस्में निभाई जाती रहेंगी तो अगले हादसे का इंतजार करिए। ये कभी भी हो सकता है।

हम सिर्फ इस सवाल के इर्द-गिर्द नहीं रुक सकते कि इमारत क्यों ढही। हमें यह भी विचार करना होगा कि छात्र ऐसी जगहों में रहने को मजबूर क्यों हुए।

अब जिम्मेदारी तय करने का वक्त है

सत्य निकेतन की घटना के बाद दिल्ली हाईकोर्ट में हुई सुनवाई में एक अहम बात सामने आई कि जिम्मेदारी केवल इमारत के मालिक तक सीमित नहीं रह सकती; विश्वविद्यालय और नगर निकायों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले का संज्ञान लिया। इससे छात्रावासों, पीजी और निजी छात्र आवासों के सुरक्षा मानकों की व्यापक समीक्षा की संभावना बनी। सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई एक रिपोर्ट में दिल्ली के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के आसपास स्थित छात्र आवासों के समयबद्ध सुरक्षा ऑडिट की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

दूसरे विश्वविद्यालयों से सबक क्यों नहीं लेते

भारत के अन्य हिस्सों से तुलना भी यहां उपयोगी है। दिल्ली विश्वविद्यालय के सामने मौजूद समस्या को यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि ‘भारत में छात्रावासों की कमी है।’

कई सार्वजनिक संस्थानों ने छात्र आवास को अपनी व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बनाया है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को ही देखें तो यहां 18 छात्रावास हैं। विवाहित छात्रों के लिए एक अलग छात्रावास है। इनकी कुल क्षमता लगभग 5,500 छात्रों की है।

हालांकि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय भी ये साफ-साफ कहता है कि प्रवेश मिलना यानी छात्रावास मिलने की गारंटी नहीं है। बावजूद इसके यहां की छात्रावास व्यवस्था विश्वविद्यालय की संगठित संस्थागत संरचना का अभिन्न हिस्सा है।

हैदराबाद विश्वविद्यालय की बात करें तो यहां 23 छात्रावास हैं। इसमें 5,000 से अधिक छात्रों के रहने की क्षमता है। विश्वविद्यालय दूर-दराज से आने वाले छात्रों को प्राथमिकता देता है।

आईआईटी दिल्ली भी अपने लगभग 13,000 छात्रों के लिए करीब 7,000 छात्रावास सीटों की व्यवस्था करता है और छात्रावास आवंटन के लिए स्पष्ट संस्थागत नीति रखता है।

इन संस्थानों में भी कमी हो सकती है। कोई भी मॉडल पूरी तरह से पूर्ण नहीं है। लेकिन अंतर यह है कि जिन संस्थानों का हमने जिक्र किया, उनके यहां छात्रावास संस्थान की योजना का अभिन्न हिस्सा है।

विदेशी विश्वविद्यालयों की व्यवस्था भी देखिए

यह दृष्टिकोण विदेशी विश्वविद्यालयों में और भी स्पष्ट दिखाई देता है। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में 2026-27 शैक्षणिक वर्ष के लिए पात्र प्रथम वर्ष के पूर्णकालिक स्नातक छात्रों को विश्वविद्यालय आवास का प्रस्ताव देने की गारंटी है, बशर्ते वे समय पर आवेदन करें और अन्य शर्तें पूरी करें।

विश्वविद्यालय एक पोर्टल के माध्यम से कमरों का आवंटन, किराये की श्रेणियां और उपलब्ध विकल्पों का मैनेजमेंट करता है।

इसका मतलब ये नहीं है कि दिल्ली को सीधे लंदन की नकल करनी चाहिए। लंदन खुद महंगे छात्र आवास और इसे वहन करने की क्षमता से जुड़ी समस्याओं से अछूता नहीं है। मुख्य बात यह है कि विश्वविद्यालय छात्र आवास की जिम्मेदारी से खुद को अलग नहीं कर सकते।

ब्रिटेन में एक ‘पर्पज-बिल्ट स्टूडेंट एकोमोडेशन’ मॉडल भी विकसित हुआ है। इसमें शुरू से ही छात्रों की जरूरतों को ध्यान में रखकर आवास तैयार किया जाता है, बजाय इसके कि बाद में सामान्य मकानों को पीजी में बदल दिया जाए।

दिल्ली को भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप इस मॉडल को अपनाने की संभावनाएं तलाशनी चाहिए।

पीजी व्यवस्था में सुधार की बड़ी जरूरत

वास्तव में भारत में सुधार की दिशा दो स्तरों पर होनी चाहिए। पहला, मौजूदा पीजी बाजार को स्पष्ट कानूनी ढांचे के तहत लाया जाना चाहिए।

बड़े छात्र आवास में छात्रों की संख्या, प्रत्येक छात्र के लिए न्यूनतम जगह, वेंटिलेशन, फायर सेफ्टी, आपातकालीन निकास और संरचनात्मक प्रमाणन जैसे अनिवार्य मानक होने चाहिए। किसी बड़े संरचनात्मक बदलाव के बाद दोबारा प्रमाणन अनिवार्य किया जाना चाहिए।

लाइसेंस तथा सुरक्षा अनुपालन से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए। पीजी आवास पंजीकरण के लिए सिंगल-विंडो व्यवस्था लागू की जानी चाहिए, ताकि नियम इतने जटिल न हों कि छोटे संचालकों को अनौपचारिक तरीके से काम करना आसान विकल्प लगे।

विश्वविद्यालय बनाएं दीर्घकालिक आवास योजना

दूसरा, विश्वविद्यालयों को छात्र आवास के लिए दीर्घकालिक योजनाएं बनानी चाहिए। केवल छात्रावास भवन बना देना पर्याप्त नहीं है।

प्रत्येक विश्वविद्यालय को यह योजना बनानी चाहिए कि अगले पांच, दस और पंद्रह वर्षों में कितने छात्र बाहर से आएंगे, आवास की कितनी मांग होगी और कितनी क्षमता विकसित करने की जरूरत होगी।

विश्वविद्यालय, राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय और निजी क्षेत्र मिलकर पर्पज-बिल्ट छात्र आवास विकसित कर सकते हैं। सार्वजनिक भूमि और कम इस्तेमाल हो रही सरकारी संपत्तियों का भी सुरक्षित और योजनाबद्ध तरीके से उपयोग किया जा सकता है।

स्टूडेंट हाउसिंग सेल बनाएं हर विश्वविद्यालय

इसके अलावा, प्रत्येक विश्वविद्यालय में एक स्टूडेंट हाउसिंग सेल होना चाहिए। यह केवल छात्रावास आवंटन कार्यालय नहीं होना चाहिए।

इसके दायरे में सत्यापित निजी आवासों की जानकारी, किराये और सुरक्षा जमा से जुड़े विवादों में मार्गदर्शन देना, स्थानीय अधिकारियों के साथ समन्वय करना और सुरक्षित पेइंग गेस्ट आवासों की सूची बनाए रखना शामिल होना चाहिए।

कोई यह उम्मीद नहीं कर सकता कि 18 या 19 साल का कोई छात्र पहली बार अपने परिवार से दूर किसी महानगर में आकर घर किराये पर लेते समय एक साथ संरचनात्मक इंजीनियर, अग्नि निरीक्षक और नगर अधिकारी की भूमिका भी निभाए।

18 या 19 साल के छात्र से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह घर किराये पर लेते समय संरचनात्मक इंजीनियर, अग्नि निरीक्षक और नगर अधिकारी की भूमिका भी निभाए।

पुरानी व्यवस्था से ही सबक सीख लीजिए

छात्रों के प्रति जवाबदेही की बात आती है तो हमारी अपनी ऐतिहासिक परंपरा किसी विदेशी उदाहरण से अधिक उपयोगी सबक देती है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्वतंत्रता से पहले ‘डेलीगेसी’ व्यवस्था स्थापित की गई थी और उसके बाद भी लंबे समय तक यह विश्वविद्यालय की संस्थागत संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रही। आज भी विश्वविद्यालय के आधिकारिक रिकॉर्ड में डेलीगेसी और ‘चेयरमैन, डेलीगेसी’ के पद का उल्लेख मिलता है।

इसी तरह, लखनऊ विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भी डेलीगेसी व्यवस्था की परंपरा रही है।

इसका उद्देश्य विश्वविद्यालय के छात्रावासों से बाहर रहने वाले छात्रों को विश्वविद्यालय से जोड़ना और उनके कल्याण, अनुशासन तथा शैक्षणिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए संस्थागत सहायता उपलब्ध कराना था।

आज इसका अर्थ यह है कि हर बड़े विश्वविद्यालय में एक स्टूडेंट हाउसिंग सेल की जरूरत है, जो जांचे-परखे आवासों की सूची प्रकाशित करे, शिकायतों का समाधान करे और असुरक्षित इमारतों की पहचान करे। भारतीय विश्वविद्यालयों को छात्र आवास को शिक्षा के हाशिये से निकालकर उसके केंद्र में लाना होगा।

अब छात्रों के आवास की नीति बदलने की जरूरत

भारतीय विश्वविद्यालयों को छात्र आवास को शिक्षा के हाशिये से निकालकर उसके केंद्र में लाना होगा। हमने विश्वविद्यालय तो बनाए, लेकिन उनके आसपास रहने वाले छात्रों के लिए पर्याप्त रूप से सुरक्षित शहरी वातावरण तैयार करने में विफल रहे।

अब सुधार का समय है, लेकिन अगली त्रासदी होने के बाद नहीं, बल्कि उसके पहले।

लेखक आदित्य लाठर ने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) और डरहम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है तथा डरहम यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष के रूप में छात्र प्रतिनिधित्व और विश्वविद्यालय मामलों से जुड़े कार्य किए हैं।

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