सॉफ्टवेयर डेवलपर से IFS बने अथर्व तिवारी: मन की आवाज़ सुनी, राह बदली, जीत रची
सॉफ्टवेयर डेवलपर की राह छोड़कर अथर्व तिवारी ने मन की सच्ची पुकार सुनी और दिशा बदली। जिद, जुनून और अटूट जज़्बे ने उन्हें असफलताओं से लड़ते हुए वन सेवा की सर्वोच्च परीक्षा तक पहुंचाया। एक बार तय की गई मंज़िल न मिलने को असफलता मानने वाले भारतीय वन सेवा 2022 बैच के अफसर अथर्व तिवारी […]
सॉफ्टवेयर डेवलपर की राह छोड़कर अथर्व तिवारी ने मन की सच्ची पुकार सुनी और दिशा बदली। जिद, जुनून और अटूट जज़्बे ने उन्हें असफलताओं से लड़ते हुए वन सेवा की सर्वोच्च परीक्षा तक पहुंचाया। एक बार तय की गई मंज़िल न मिलने को असफलता मानने वाले भारतीय वन सेवा 2022 बैच के अफसर अथर्व तिवारी से खुद बता रहे अपनी कामयाबी की कहानी।
जीवन की शुरुआत
मैं अथर्व तिवारी, मध्य प्रदेश के भोपाल का निवासी हूं। मैं भारतीय वन सेवा के अधिकारी के तौर पर जम्मू-कश्मीर में तैनात हूं। अगर कोई मुझसे पूछे कि मैं यहां तक कैसे पहुंचा, तो मैं यही कहूंगा। यह यात्रा कभी सीधी सड़क की तरह नहीं थी। यह उन जंगल की पगडंडियों जैसी थी, जिनमें मोड़, ऊबड़-खाबड़ रास्ते और कभी-कभी खो जाने का डर भी होता है। लेकिन इन्हीं रास्तों पर चलते-चलते इंसान खुद को पहचानता है और अपने भीतर की आवाज़ सुनना सीखता है।

परिवार और बचपन
बचपन से ही मुझे घर में शिक्षा और ईमानदारी परंपरा के तौर पर मिली। मेरे पिता मध्य प्रदेश शासन में स्टेट सिविल सर्विस के अधिकारी थे और मेरी मां एक स्थापित शिक्षाविद् थीं। उनके मूल्य और सादगी मेरे जीवन की पहली सीख बने।
लेकिन यह भी सच है कि बचपन में मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे भी सिविल सेवा में जाना चाहिए। मेरे सपने तकनीक और कंप्यूटर से जुड़े थे, इसलिए मैंने इंजीनियरिंग चुनी और कंप्यूटर विज्ञान और इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री प्राप्त की।
करियर की शुरुआत
कॉलेज के बाद मेरी पहली मंज़िल बनी गुरुग्राम की एक सॉफ्टवेयर कंपनी। यहां मैं सॉफ्टवेयर डेवलपर के रूप में काम करता था। नौकरी अच्छी थी। माहौल पेशेवर था। करियर का ग्राफ भी ठीक दिख रहा था। मैं अपनी पसंद के क्षेत्र में आया था। अपनी मर्जी से सॉफ्टवेयर इंजीनियर बना था। लेकिन मन के किसी कोने में एक खालीपन भी था, जिसे मैं उस समय पहचान नहीं पाया। कंप्यूटर के सामने बैठकर कोड लिखते-लिखते कई बार लगता था कि कहीं न कहीं जीवन मुझसे कुछ और चाहता है। ऐसा कुछ, जिसमें इंसानों, प्रकृति और समाज से गहरा जुड़ाव हो।
यूपीएससी की ओर पहला कदम
मेरे पिता ने मेरी इस कमी, इस बेचैनी को पहचान लिया। उन्होंने मुझे यूपीएससी की तैयारी के लिए प्रेरित किया। इतना तय था कि नौकरी करते हुए तैयारी करना संभव नहीं था। हालांकि नौकरी छोड़ना आसान भी नहीं था। क्योंकि वर्तमान में मेरे पास एक नौकरी थी। भविष्य की बात करें तो कुछ भी तय नहीं था। लेकिन मेरा संकल्प मजबूत था। अंततः मैंने निर्णय लिया कि अब अपने भीतर उठती आवाज़ को अनसुना नहीं करना चाहिए। मैंने नौकरी छोड़कर पूरी लगन से यूपीएससी की तैयारी शुरू की।

पिता मेरे सबसे बड़े मार्गदर्शक थे। वहीं मेरी मां ने कठिन समय में मुझे भावनात्मक रूप से संभाला। उन्होंने असफलताओं पर हौसला दिया और हमेशा विश्वास दिलाया, “अंत में सफलता तुम्हारी ही होगी।”
मध्य प्रदेश वन सेवा और अनुभव
यूपीएससी के साथ मैं स्टेट सर्विस की परीक्षा में शामिल होता रहा। साल 2017 में, मैंने मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास की और मध्य प्रदेश वन सेवा में चयनित हुआ। इस सेवा ने मुझे जंगल, वन्यजीवों, स्थानीय समुदाय और पर्यावरण की वास्तविक दुनिया से परिचित कराया। यह मेरे लिए सिर्फ नौकरी नहीं थी। यह प्रकृति के साथ एक जीवंत संवाद था। मुझे समझ आ गया कि यही मेरी असली राह है।
यूपीएससी की तैयारी और असफलताएं
इन वर्षों में, मैंने कई बार यूपीएससी सिविल सेवा के इंटरव्यू दिए। हर इंटरव्यू, हर प्रयास ने मुझे कुछ नया सिखाया। इसी दौरान मैंने कई अन्य अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन भी किया, क्योंकि मैं जानता था कि इस यात्रा में किसी प्रेरक साथी का होना कितना महत्वपूर्ण है।
जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि मैं स्टेट सर्विस में 2017 में ही सेलेक्ट हो गया। लेकिन यूपीएससी में सफलता अब भी मुझसे कोसो दूर थी। यह आसान यात्रा नहीं थी। यूपीएससी में लगातार असफलताएं मेरे जीवन का हिस्सा बन चुकी थीं। लेकिन मैंने हमेशा उन्हें एक स्पीड ब्रेकर की तरह ही माना। मैं कई बार गिरा। टूटा भी। लेकिन कभी हारा नहीं। रुका नहीं। हर असफलता के बाद मैंने तुरंत उठ खड़ा होना सीख लिया।
एक यादगार किस्सा
2017 में यूपीएससी का पहला इंटरव्यू दिया था। ये काफी अच्छा गया। उम्मीद थी कि सफलता मिलेगी। तब 2018 की प्रारम्भिक परीक्षा में केवल 10 दिन बचे थे। मैं घर पर ही था। 2017 की परीक्षा के नतीजे आए। मेरा सेलेक्शन नहीं हुआ। सफलता न मिलने पर आंखों में आंसू आ गए। लेकिन फिर मैंने सोचा अब जो हुआ सो हुआ। अब आगे की देखना है। अगले ही पल मैंने करंट अफेयर्स की किताब उठाई और अध्ययन शुरू कर दिया।
हर असफलता के बाद मैंने अपनी रणनीति बदली और स्मार्ट मेहनत अपनाई। जीवन ने यही सिखाया, “मेहनत और ईमानदारी हमेशा पुरस्कृत होती है।” इस विश्वास ने मुझे थामे रखा।

आईएफएस 2022 – सफलता का क्षण
फिर आया 2022 का वह निर्णायक साल। जब परिणाम आया और मैंने ऑल इंडिया रैंक 42 के साथ भारतीय वन सेवा परीक्षा पास की, वह क्षण अद्भूत था। मैं उस समय भोपाल के पास नजीराबाद रेंज में फॉरेस्ट रेंजर के तौर पर तैनात था। जिस दिन परिणाम आया, छुट्टी की वजह से मैं घर पर ही था। लेकिन मैं फोन बंद करके सो गया था।
जब सोकर उठा और फोन ऑन किया तो एक मित्र का काल आया। उसने बधाई दी। इतनी बार असफलता मिलने के बाद पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ। फिर उस दोस्त ने कहा, “भाई, सच में हो गया।”सबसे पहले मैंने माता-पिता के चरण छुए। थोड़ी देर में हृदय में जो हलचल थी, वह शांत हो गई। पास के लोग खुश थे, लेकिन मेरे लिए यह राहत थी। आखिरकार, मेरी मेहनत रंग लाई। उस दिन मुझे महसूस हुआ कि प्रकृति ने मेरे लिए यह निश्चित रूप से यही रास्ता चुना था।
जम्मू-कश्मीर में अनुभव
मुझे एजीएमयूटी कैडर आवंटित हुआ। मेरी पहली पोस्टिंग जम्मू और फिर श्रीनगर में हुई। जम्मू-कश्मीर की घाटियां, जंगल और लोग मुझे जीवन की ऐसी सीख दे गए, जो कोई किताब नहीं दे सकती। यहां की हवा ने मुझे विनम्रता सिखाई। लोगों ने शालीनता का महत्व समझाया। प्रशासनिक चुनौतियों ने भावनात्मक स्थिरता की आवश्यकता को गहराई से समझाया।

आज मैं जानता हूं कि एक सफल सिविल सेवक सिर्फ नियम लागू नहीं करता। वह इंसानों को समझता है। उनकी भावनाओं का सम्मान करता है और प्रकृति का संरक्षक बनता है।
शारीरिक फिटनेस का महत्व
मेरी इस यात्रा में एक और तत्व हमेशा साथ रहा, शारीरिक फिटनेस। मेरा मानना है कि वन सेवा हो या कोई भी प्रशासनिक सेवा, फिट रहना बहुत आवश्यक है। मैं नियमित दौड़ता हूं, शारीरिक अभ्यास और जिम करता हूँ। फिटनेस मेरे लिए सिर्फ शरीर को मजबूत रखने का जरिया नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता का आधार भी है।
सीख और संदेश
अगर आज कोई मुझसे पूछे कि मेरी सबसे बड़ी सीख क्या है, तो मैं यही कहूंगा, इस परीक्षा को या किसी भी जीवन-कार्य को युद्ध समझो। यह संदेश मुझे श्रीकृष्ण की वाणी से मिला, जिसे मैंने हमेशा अपने मन में रखा, “जब युद्ध में उतरना ही है, तो जीतकर ही लौटना है।”
UPSC की यात्रा भी एक युद्ध है। कभी अपने मन के साथ, कभी समय के साथ, कभी असफलताओं के साथ। लेकिन अगर संकल्प पवित्र हो, मेहनत ईमानदार हो और लक्ष्य स्पष्ट हो, तो जीत निश्चित है। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो मुझे लगता है कि मेरी राह शायद पहले से लिखी हुई थी। गुरुग्राम का वह सॉफ्टवेयर डेवलपर, जो कभी अपने भविष्य को लेकर उलझा हुआ था, आज जंगलों, पहाड़ियों और समाज की सेवा कर रहा है।
मेरी कहानी का सार यही है, “न तो शुरुआत मायने रखती है, न संघर्ष का आकार… मायने रखता है तो बस यह कि आप अंत तक टिके रहते हैं या नहीं।”
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