सुखी जीवन का सरल मार्ग: माया-मोह और अहं या संस्कार एवं अध्यात्म?
आखिर सुखी जीवन क्या है? और इसे पाने का सरल मार्ग क्या है? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब हर व्यक्ति अपनी समझ और आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर करता है। लेकिन ये समझ लीजिए कि सुखी जीवन का सार आपकी समझ और आवश्यकताओं में नहीं है। इस लेख में दिल्ली के मशहूर गंगाराम अस्पताल […]
आखिर सुखी जीवन क्या है? और इसे पाने का सरल मार्ग क्या है? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब हर व्यक्ति अपनी समझ और आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर करता है। लेकिन ये समझ लीजिए कि सुखी जीवन का सार आपकी समझ और आवश्यकताओं में नहीं है। इस लेख में दिल्ली के मशहूर गंगाराम अस्पताल के बेहोशी विभाग में सीनियर कंसल्टेंट डॉ. भुवन चंद्र पाण्डेय बता रहे हैं सुखी जीवन का सरल मार्ग
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् | इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् || भगवद गीता – अध्याय 16, श्लोक 13
अज्ञानता और मोह से ग्रसित लोग जो धन और कामनाओं में अंधे होते हैं, वे सोचते हैं कि उन्होंने आज इतना धन प्राप्त कर लिया है और अपनी भविष्य की अन्य इच्छाओं को भी पूरा कर लेंगे, और यह सब उनका है। वे खुद को भगवान के समान, शक्तिशाली, सुखी और भोक्ता मानते हैं।
कुछ समय पूर्व एक सम्मेलन (कॉन्फ्रेंस) में हम तीन-चार लोग बात कर रहे थे तो बातचीत के दौरान ही एक परिचित का मित्र वहां पर आया और अपने बारे में बातें बताने लगा, लगभग 20 मिनट की बातचीत में उसने अपने बारे में इतना सब बताया कि आधे घंटे बाद पूरे सम्मेलन में शायद हम चार लोगों को उसके बारे में सबसे ज्यादा पता था I उसकी पूरी बातों का सार था कि जीवन में सबसे ज्यादा संघर्ष उसी ने किया है और जीवन की हर दिशा में वह सफल है I कुल मिलाकर अपने को बड़ा व बेहतर बताने व जताने में ही ज्यादा जोर था l उसके जाने पर हमने भीनी सी मुस्कान क़े साथ एक दूसरे की आँखों को पढ़ा और सभागार चले गये I वैखरी (वाणी) के कम्पित शब्दों में शायद उतना मार्मिक भाव व गहनता नहीं आ पाती जितना हम अपनी आँखों से एक दूसरे को संप्रेषित कर चुके थे l
इसी प्रकार एक बार जब मैं एक विवाह-समारोह में बहुत से नाते-रिश्तेदार व मित्रगणों से मिला तो सामाजिक बातों को लेकर विचार-विमर्श का दौर भी चल पड़ा I कुछ देर की बात होने पर वे लोग जो कि कुछ ऊंचाई का पद, प्रतिष्ठा, मान-सम्मान एवं विशाल संपत्ति रखते थे, उनकी बातों में यह बात झलकने लगी कि उन्हें पैसे के अतिरिक्त कुछ औऱ नहीं दिखाई दे रहा था l कुछ लोग ऐसी बातें कर रहे थे जैसे भगवान के बाद उनका ही नंबर हो, जैसे यहां कमाया हुआ सब साथ ले जायेंगे I सहसा ही मस्तिष्क के तंतुओं में महाभारत में पूछा गया यक्ष का प्रश्न कौंध गया, जिसके उत्तर में पांडव श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा था ‘संसार की सबसे आश्चर्य जनक बात है ‘सबको यह ज्ञात है कि एक दिन संपत्ति, मान-सम्मान सब यहीं छोड़ कर चले जायेंगे, पर फिर भी जीवन भर जोड़ने में लगे हैं’ और अर्जित करके फिर क्षणभंगुर माया और अहं के जाल में फंसते जाते हैं l
पद, नाम औऱ संपत्ति के होने पर तो सभी पूछते हैं पर व्यक्ति इस भ्रम में पड़ जाता हैं कि यह उसकी साख के कारण है, जबकि वास्तविकता में यह पूछ केवल उसके पद की है l पद के ना रहने पर, उसके निजी व्यवहार व कर्त्तव्य परायण कार्य के कारण उसे जो सम्मान मिलता है वही उसका अर्जित धन है और यही अंतर्मन की शांति देता है l
कुछ महीने पहले की बात है कि अभी माता-पिता की चिता की राख ठंडी भी ना हुयी थी कि उनके पुत्रों ने उनकी संपत्ति का बंटवारा कर दिया औऱ कुछ चीजों को लेकर विवाद उत्पन्न कर दिया औऱ एक दूसरे से शत्रुता मोल ले ली l केवल पैसे के लिए ऐसा अनमोल प्रेम का नाता तोड़ देना बड़ा ही दुःख दायी था l भाई-भाई का या भाई-बहन का नाता तो बड़ा ही अनमोल होता है, कुछ नश्वर चीजों के लिए उसे तोड़ देना मेरी समझ से परे था l उथला प्रेम तो भौतिकता से या कुछ पाने की चाहत से ही बंधा होता है, प्रेम में समर्पण ही ना हो तो वो प्रेम ही क्या?
कुछ वर्ष पूर्व ऐसे ही एक अस्पताल के सम्मेलन में गया तो वहां हो रहे व्यावहारिक व प्रासंगिक व्याख्यान एवं उच्च-कोटि के ओजपूर्ण वक्ता उस सम्मेलन को अलग ऊँचाई प्रदान कर रहे थे l दोपहर को भोजनावकाश के समय जब भोजनालय में प्रवेश करने लगे तो देखा कि द्वार के निकट ही साधारण सी वेशभूषा में एक बुजुर्ग दंपत्ति, प्रणाम की मुद्रा में सभी का अभिवादन कर रहे थे, मुझे कुछ अचरज हुआ कि यह यहां कैसे और क्यों खड़े हैं, औऱ क्यों सबका अभिवादन कर रहे हैं? जब उनके बारे में पता किया तो ज्ञात हुआ कि वह और कोई नहीं बल्कि इस पूरे अस्पताल के मालिक हैं l कुछ दशक पहले इन्होने बड़ी मेहनत से इस दैवीय कार्य का शुभारम्भ किया था, जिससे सबको स्वास्थ्य सबंधी सुविधाएं मिल सकें l बुद्धि नतमस्तक और मन भावविभोर था क़ि इतनी ऊंचाई पा लेने के बाद भी भूमि पर हैं, अहं का दंश उन्हें छू भी नहीं पाया है औऱ उनके अंतर्मन ने विनम्रता की सुनहरी दोशाला को ओढ़ रखा है l सच ही तो कहा है कि जो जितना झुकता जाता है वो उतना उठता जाता है l
कुछ समय पश्चात् एक धर्मार्थ चिकित्सालय से सम्बंधित बैठक क़े दौरान जब एक नामी गिरामी अस्पताल के मुखिया से मुलाक़ात क़े दौरान उन्हें सहायता के लिए धन्यवाद दिया, तो उन ‘वृद्ध’ पर सशक्त व्यक्तित्व के स्वामी ने मधुर वाणी में एक संछिप्त वाक्य कहा कि ‘ नेकी कर दरिया में डाल’ और मुस्कुरा दिए, साफ अर्थ था कार्य करो और भूल जाओ, दुनिया भर में गाने की जरुरत नहीं है l हृदय कृतज्ञ महसूस कर रहा था कि ऐसी सोच वाले व्यक्तित्व के सानिध्य में बैठने का सौभाग्य मिला हैl पुस्तकों में तो पढ़ा था ‘दान ऐसे दो कि एक हाथ से दिया दान दूसरे हाथ को भी पता ना चले’ पर प्रत्यक्ष प्रमाण का संभवतः प्रथम अनुभव था I
ऐसे ही हमारे एक प्रिय वरिष्ठ जब यूरोप गये तो वहां एक वृद्ध महिला को रेलगाड़ी से अपना सामान उतारने में परेशानी हो रही थी, उन्होंने बिना सहायता मांगे ही उसकी मदद की l उसने धन्यवाद के बाद पूछा कि क्या आप भारत से हैं ? जब हमारे वरिष्ठ ने पूछा कि आप को कैसे पता कि मैं भारत से हूं? तब उस प्रसन्नचित्त वृद्धा ने कहा कि एक भारतीय ही ऐसा कर सकता है l ये बात सुनकर किस भारतीय का सीना गर्व से नहीं फूल जाएगा l संस्कार व नैतिकता, पुस्तकों में लिखने व रटने पर नहीं बल्कि व्यवहार में लाने के लिए होती है जो आपके व्यवहार में झलक जाती हैI हमारी संस्कृति में समयानुसार होने वाला बदलाव उसे व्यावहारिक और प्रासंगिक बना देता हैl
उपरोक्त अनुभव आजकल की पीढ़ी की मन: स्थिति को दर्शाती है, जो अधिकतर पश्चिमी सभ्यता की चमक-धमक से प्रभावित होकर उनका अंधा अनुसरण कर रहे हैं वे चाहते हैं तो केवल जल्दी पैसा कमाना और भोगना I स्वयं ही मौज-मस्ती क़े बहाव में बह कर घर-परिवार, नाते-रिश्तेदार व समाज से दूर चले जाते हैं I वे अपने कर्तव्य की बात नहीं करते या उसका निर्वाह नहीं करते पर अधिकार की बात जरूर करते हैंl फिर एकदम अलग-थलग होकर मानसिक तनाव में जीवन बिताते हैं या दिखावे में ही पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं औऱ जब सब-कुछ छूट जाता है तो केवल एकाकी जीवन ही रह जाता हैI फिर जीवन में जरा सा झंझावात आया नहीं कि विनाशकारी कदम उठा लेते हैं, क्यूंकि सामाजिक संबंधों व जीवन को उत्साह से भरने वाले त्यौहारों व क्रिया-कलापों से अपने को दूर कर वे उन अगोचर तंतुओं को तोड़ देते हैं ज़ो जीवन की वास्तविक डोर हैं और स्थिरता प्रदान करते हैं l
बाद में लिखे अनुभव उन विभूतियों के हैं जिन लोगों ने अथक परिश्रम किया है, अनेक तूफ़ानों से टकराकर, ना सिर्फ सामना किया बल्कि इस संघर्ष में जीतकर सफलता पूर्वक आगे बढ़े हैं l जिन्होंने जीवन क़े सपनों को साकार करने में बुद्धि-मन-शरीर को कठिन परिश्रम की तपती रेत में तपाया है l यही कारण है कि उन्हें संघर्ष का मोल पता है, औऱ वो छोटी-मोटी आँधियों से नहीं घबड़ाते हैं l अथक परिश्रम व सही दिशा में होने वाला कार्य आपको ऊर्ध्व दिशा की ओर ले जाता है l यदि देह को स्वेद (पसीना) से सिक्त (सींचना) ना कराया तो ऐसी युवावस्था भला किस काम की l हम बिना कालकूट विष को धारण किये ही शिव जी की तरह अमरता प्राप्त कर लेना चाहते हैं l हमें स्मरण रखना होगा कि कालकूट धारण किये बिना शिवतत्त्व की प्राप्ति संभव नहीं हो सकती है, वैसे ही जैसे वनवास जाए बिना श्री राम जी की कल्पना अधूरी है l
आज हम विषपान करना भूलते जा रहे है क्यूंकि कोई भी दुरूह कार्य बिना कठिन परिश्रम के संभव नहीं हैI तुरंत पैसा और चमत्कारिक रूप से पैसा कमाने की चाह में, किसी और के साथ प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में या झूठी शान दिखाने में हम स्वयं से दूर जा रहे हैं।
हम वो बनना चाहते हैं ज़ो हम प्राकृतिक रूप से नहीं हैं l पाश्चात्य जगत चकाचौंध औऱ भौतिकता से भरा पड़ा है, पैसा कमाने की होड़ में सम्पूर्ण जीवन लगाया , लगातार भोग किया औऱ विलासिता पूर्ण जीवन जिया, अंत में इह लीला समाप्त हुई l कुल मिला कर बात यह है कि जो जिस भी दिशा में कार्य करेगा और जिसका भी अनुसरण करेगा वो वैसा ही बनता जायेगा l यहीं एक प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या जीवन केवल इसीलिए है? इसका उद्देश्य क्या है? ये कभी भोग की सोच वाले नहीं बता सकते l पार्टी-हो हल्ला, कैसा भी खाना खा लेना, असमय सोना-जागना औऱ बिना किसी उचित यम-नियम के जीवन-यात्रा के पथ पर चलना l ये कभी जीवन को संतुलित नहीं रख सकते हैं, आज नहीं तो कल, गंभीर परिणाम का सामना तो करना ही पड़ेगा l पश्चिमी सभ्यता से या किसी भी देश से उनकी अच्छी बातें सीखनी चाहिए ना कि उनकी खराब बातें I
जब अपने पर पूर्ण नियंत्रण करके मन और प्राण को साध ले तभी उसके परे जा सकते हैं I एक बार साध लिया तो फिर कालातीत होना अवश्यम्भावी हो जाता है, जो साधारण कार्यों से कदापि संभव नहीं है l बहुत कुछ त्यागना पड़ता है और बहुत कुछ साधना पड़ता है l समुद्र मंथन में भी पहले विष ही निकला था और फिर अंत में अमृत l शिवतत्त्व का अर्थ है पूर्ण समर्पण के बाद उत्पन्न सम्पूर्ण विश्वास I सहस्त्र वर्षों से भारतीय मनीषियों ने प्रत्यक्ष सत्ता के पार स्थित उस उन्मुक्त, निर्लिंप्त , निर्विकार, निर्गुण, अव्यक्त व अकथ परमपुरुष की अवधारणा को साधारण जनमानस के लिए सरलता से उकेरा है l जिससे वे लाभान्वित हो सकें और कल्याणमयी ऊर्ध्व गति पा सकें, लेकिन माया की सत्ता फिर उसे अपने मोह-पाश में बाँध कर भूमि पर पटक देती है l
हमारे पूर्वजों ने जीवन की अवश्यकताओं को पूरा करते हुऐ कैसे संतुलित रहा जाये, इस पर कार्य किया और पूरे जन-मानस तक पहुँचाया l एक दूधमुँहे शिशु से लेकर मृत्युशय्या तक, यहां तक की चिता की भस्म बनने की पूरी जीवन यात्रा को कैसे सभी लोग एक दूसरे के सहयोग और सांस्कृतिक समन्वय से कैसे पूर्ण कर सकते है, यह केवल भारतीयता की ही देन है I संस्कृति जीवन का आधार बनाती है और अंतर्मन उसकी दिशा तय करता है l भारतीयता का अर्थ है जीवन के सारे आयामों का सुघड़ समन्वय, हमें अर्थ चाहिए पर केवल अर्थ से ही काम नहीं चलेगा, हमें विभिन्न कामनाओं की पूर्ति भी चाहिए, लेकिन केवल उससे भी काम ना चलेगा l हमें उचित सामाजिक व्यवस्था के लिए धर्म की स्थापना करनी भी आवश्यक है, फिर चौथा पुरुषार्थ मोक्ष, जो इन सबसे ऊपर उठा दे और भव-सागर के बंधन तोड़ दे l कुल मिलाकर भारतीयता में सारे आयाम सन्निहित हैं-जैसे भौतिकता, सामाजिक-समरसता, जीवन को उत्साहित व ऊर्जावान बनाने वाले सांस्कृतिक त्यौहार, संतुलित भोजन और उचित आचरण, बच्चों के लिए माता-पिता का प्यार व अनुशासन, तथा साथ ही साथ सिर पर होता है बुजुर्गों क़े अनुभव का वरद हस्त I हमारी संस्कृति सिखाती है, आयु हो जाने पर बुजुर्गों लिए आदर-भाव व देख-रेख की भावना तथा अध्यात्मिकता के अलौकिक रस से सींची गयी बेजोड़ नैतिकता की परिपक्वता, व प्रकृति के कण-कण से प्रेम का भाव I कुल मिलाकर भाव ऐसा रखें कि पैर सदैव धरती पर ही रहें क्यूंकि ‘जो बैठा है धरती पर उसे नीचे कौन बैठाएगा’I
ये महा-वीरों की भूमि है, जिसकी देह में देश बसा l ये पूर्ण समर्पण की भूमि, राजा भी था वैदेह बना l
ये आर्यावर्त्त की पुण्य भूमि, जिसको ऋषियों ने सींचा है l महादेव हो करके भी, बांधते धर्म की रेखा है II
नारी की लाज बचाने को, सारी लंका का नाश हुआ l ये इक्ष्वाकु की पुण्य धरा, जिसने मर्यादा को पुन: रचा l
पहने किरीट कर्तव्य का, जो राजा से था रंक बना l ये पूर्ण समर्पण की भूमि, जहाँ देवों का वास हुआ II
पूर्वजों व ऋषि मुनियों द्वारा दिखाए गये सन्मार्ग को एक पथिक की तरह अनुसरण करने के कारण, अनगिनत जन्मों से परिष्कृत होते हुए हम भारतीयों में उत्कृस्ट गुणसूत्रों का विकास हुआ है, ये गुणसूत्र जो कि वेणी में गुंथे बालों की तरह एक दूसरे से चिपके हुए हैं पर सूक्ष्म रूप से अनेकों गुण इसमें विद्यमान रहते हैं l अद्वितीय समर्पण और वीरता के साथ-साथ, हम प्रकृति और प्रेम से ओत प्रोत इस महान संस्कृति के संवाहक हैं l संभवतः इसी कारण से सैकड़ो वर्षों के आक्रमण और पराधीनता के बाद हमने अपनी कमियों को पहचाना और दूर किया, यही कारण है कि वर्तमान में हम फिर उसी साहस और गर्व से उठ खड़े हुए हैं l महासागर के जल से बनी स्याही कम पड़ जाएगी, पर बलि-वेदी पर जीवन की आहुति देने वालों की नामावली ना रुक पायेगी l यही कारण है कि जिन लोगों ने हमें मिटाने की सोची वर्तमान में या तो वो स्वयं मिट गये या फिर आज कहीं नहीं टिक रहे हैं l
जब अतिशय भूख लगी हो तो भोजन के अतिरिक्त कुछ नहीं सूझता पर तृप्त होने के बाद व्यक्ति उसके आगे की सोचता हैl ठीक इसी प्रकार प्रारंभिक अवस्था में अपरिपक्वता के कारण भौतिकता की तड़क-भड़क लुभावनी लगती है पर समय क़े साथ उसकी चमक का क्षय हो जाता है l चाहे कोई कितना भी बड़ा हो और किसी भी क्षेत्र में शिखर पर पहुंचा हो, सब की परिणति एक सामान होती है, शेष रह जाती है केवल-‘राख’ l जीवन में जब कभी गंभीर स्वास्थ्य समस्या उत्पन्न हो जाती है या वह अवस्था जब सब कुछ हाथ से निकल जाता है और लोग कहते हैं कि ‘ अब कुछ नहीं हो सकता, अब सब कुछ भगवान के हाथ में है, उन्ही से प्रार्थना करो ‘ तो सारा का सारा ‘अहं’ जो कि कठोर चट्टान की भांति होता है, गरम मक्खन की भांति पिघल जाता हैl भूमि तत्त्व के अवयव (ज़मीन-जायदाद, पैसा) कुछ काम के नहीं रहते हैं, जल तत्त्व सूख जाता है औऱ अग्नि तत्त्व कुछ समय का ईंधन प्रदान करता हैl सारी की सारी अकड़ वायु तत्त्व में विलीन हो जाती है औऱ अंत में आकाश तत्त्व का गुण ‘शब्द’ रह जाता है l
हम उस गुह्य ज्ञान के वंशज हैं जो त्याग और समर्पण की पराकाष्ठा के परे, कुछ खोजने की इच्छा रखते हैं l हमारे मनीषीयों का वैचारिक चिंतन निरंतर ही इस बात को जानने का रहा कि दृश्य और अदृश्य की सत्ता के परे क्या? उसके भी पार और क्या? उस पराकाष्ठा के पार भी कुछ और होने की संभावना है क्या? पहले इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि ,प्राण, आकाश, व्योम, पराव्योम, तारामंडल, निहारिकायें व अनंत तक का फैला साम्राज्य, एक अकल्पनीय परिकल्पना l चिंतन की इस परिपाटी ने हमें बताया कि पराव्योम की पराकाष्ठा के पार भी कुछ है, जहां ‘अपरा’ से परे ‘परा’ विद्यमान है, वो जो दृश्य औऱ अदृश्य जगत का भी मूल है l मानव जीवन की अंतिम परिणति उस परम तत्त्व को जानना है, जिसको जान लेने क़े बाद कुछ और जान लेना शेष नहीं रहता अर्थात वह सब कुछ जान जाता हैl मानव जीवन का उद्देश्य है परम तत्त्व में सायुज्य (एकाकार) हो जाना जिससे यह कोलाहल भरा आवागमन समाप्त हो और चिर स्थिरता व चिदानंद प्राप्त हो l
गभीरम अवतर उन्नतिम अवापस्यसि यानी गहराई में जाओ और ऊँचाई प्राप्त करो।

लेखक डॉ. भुवन चंद्र पाण्डेय, दिल्ली के प्रसिद्ध गंगाराम अस्पताल में बेहोशी (एनेस्थिसिया) के डॉक्टर हैं। ऑपरेशन टेबल पर मरीजों को रिलैक्स करने में उन्हें महारत हासिल है।