IRS अफ़सर रोहित मेहरा की पेड़ों की पाठशाला, बच्चे सीख रहे प्रकृति का जादू
हरियाली के लिए समर्पित आईआरएस अधिकारी रोहित मेहरा ने एक अनूठी पहल की शुरुआत की है। बच्चों को प्रकृति से जोड़ने के लिए उन्होंने ‘पेड़ों की पाठशाला’ शुरू की है। इस पाठशाला में बच्चे पौधों और पेड़ों के बारे में किताबों से नहीं, बल्कि सीधे प्रकृति के संपर्क से सीखते हैं। रोहित मेहरा की यह […]
हरियाली के लिए समर्पित आईआरएस अधिकारी रोहित मेहरा ने एक अनूठी पहल की शुरुआत की है। बच्चों को प्रकृति से जोड़ने के लिए उन्होंने ‘पेड़ों की पाठशाला’ शुरू की है। इस पाठशाला में बच्चे पौधों और पेड़ों के बारे में किताबों से नहीं, बल्कि सीधे प्रकृति के संपर्क से सीखते हैं। रोहित मेहरा की यह पहल बच्चों के मन में हरियाली के प्रति नया जागरण पैदा कर रही है। इस पाठशाला के नन्हे हरियाली योद्धा पर्यावरण संरक्षण का बिगुल बजा रहे हैं।
रोहित मेहरा—ट्री मैन की पहचान
रोहित मेहरा भारतीय राजस्व सेवा के 2004 बैच के अधिकारी हैं। उन्हें हरियाली से गहरा लगाव है। वे प्रकृति-प्रेम को जीवन का मिशन बना चुके हैं। IRS अफ़सर रोहित मेहरा को लोग प्यार से “ट्री मैन” कहते हैं। पेड़ों को बचाने और बढ़ाने के नए प्रयोग और प्रयास करते रहते हैं।
पेड़ों की पाठशाला: किताबों से बाहर सीखने की सोच
रोहित मेहरा की सोच है कि पर्यावरण और प्रकृति के बारे में बच्चों को किताबों से बाहर भी सीखने का मौका मिलना चाहिए। इसी सोच से उनकी सोसायटी के छोटे-से गार्डन में जन्म हुआ—दुनिया की पहली School of Trees, यानी पेड़ों की पाठशाला का। यह पाठशाला किसी कमरे में नहीं, पेड़ों की छांव के नीचे चलती है। कोई कॉपी, कोई किताब नहीं—बस मिट्टी, पत्तियाँ, धूप, हवा और बच्चों की जिज्ञासा।

रोहित मेहरा की पत्नी गीतांजलि मेहरा और परिवार के बाकी सदस्य भी इस बदलाव का हिस्सा हैं। इस परिवार ने मिलकर अपने आसपास की हरियाली को बच्चों का नया क्लासरूम बना दिया है।
सप्ताहांत की कक्षाएं: जहां किताबें नहीं, प्रकृति पढ़ाती है
हर शनिवार और रविवार को पेड़ों की यह पाठशाला चलती है। कक्षा 2 से 10 तक के बच्चे यहां दो घंटे के लिए मिलते हैं। इनमें 75 फीसदी समय व्यावहारिक सीख के लिए होता है—पौधे लगाना, मिट्टी की पहचान, पत्तियों को समझना, पेड़ों को छूकर जानना। शेष समय में बच्चे आपस में पेड़-पौधों के बारे में बातचीत करते हैं। इस क्लास की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहां न कोई किताब होती है, न कॉपी—सिर्फ प्रकृति।
पेड़ों को समझने की कोशिश: एक अलग खोज
पेड़ों की यह पाठशाला पहले ही दिन से हिट है। पहली ही क्लास में 40 बच्चे आ पहुंचे। पहली कक्षा में बच्चों ने मोरिंगा (ड्रमस्टिक) का पौधा देखा, उसकी पत्तियाँ सूंघीं और उसकी उपयोगिता जानी। कई बच्चों ने अगले दिन घर से मोरिंगा की पत्तियां लाकर बताया—“ये सब्ज़ी हमारे घर में बनती है।” उन्हें पहली बार लगा कि कोई पौधा पढ़ने से नहीं, उसे महसूस करने से समझ आता है।
उन्होंने यह भी देखा कि कैसे पत्तियां सूरज की ओर घूम जाती हैं, कैसे जड़ें मिट्टी में जीवन खोजती हैं, और कैसे पेड़ भी सांस लेते हैं।
इस पाठशाला में बच्चों का पहला सवाल था—“मनुष्य और पेड़ में क्या फर्क है?” कुछ बच्चों के सवाल मज़ेदार थे—“पानी ऊपर जाता है या नीचे?” और कुछ गंभीर—“कौन-सा पेड़ बिना बीज के उगता है?”यह पढ़ाई नहीं, एक खोज थी—हर बच्चा अपनी तरह से पेड़ों की भाषा समझ रहा था।

हर सोसायटी की चाहत: हमारे यहां भी हो पाठशाला
यह पाठशाला अभी उनकी सोसायटी तक सीमित है, लेकिन इसका असर दूर तक जा रहा है। लोग पूछते हैं— “हमारे बच्चे कब शामिल हो सकते हैं?” रोहित मेहरा चाहते हैं कि हर स्कूल हफ्ते में दो घंटे प्रकृति को दे। बच्चों को वेस्ट मटेरियल से पौधे लगाना सिखाया जाए। उनके अनुसार असली शिक्षा प्रकृति में ही है। उनकी कोशिश केवल बच्चों को जोड़ने की नहीं है, बल्कि वे चाहते हैं कि हर व्यक्ति प्रकृति से जुड़कर अपनी जिम्मेदारी समझे।
पाठशाला की खासियत: सीधे प्रकृति से साक्षात्कार

पेड़ों की पाठशाला इसलिए खास है क्योंकि यह बच्चों को सीधे प्रकृति से जोड़ती है। यहां पढ़ाई कलम और किताबों से नहीं होती। यहां पढ़ाई आंखों से देखकर, हाथों से छूकर होती है। मिट्टी को छूने से, पत्तियों को महसूस करने से, बीज बोने से बच्चे प्रकृति को करीब से समझते हैं। बच्चे पेड़ों के “पेरेंट” बनते हैं—उन्हें पानी देते हैं, उनका ध्यान रखते हैं। यही जिम्मेदारी धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बनती है।
छोटी शुरुआत, बड़ा बदलाव: कहानी अभी जारी है
पेड़ लगाना आसान है, लेकिन पेड़ से रिश्ता बनाना मुश्किल। रोहित मेहरा ने बच्चों को यह रिश्ता बनाना सिखाया है। उनका मानना है कि अगर एक गार्डन क्लासरूम बन सकता है, तो एक बच्चा भविष्य बदल सकता है। आज यह छोटा बगीचा शिक्षा दे रहा है, कल यही आंदोलन लोगों को हरियाली की तरफ मोड़ सकता है। आज बच्चे पेड़ों को छूना सीख रहे हैं, कल वे धरती की रक्षा करेंगे। और शायद—यही बदलाव एक दिन पूरे देश में फैल जाएगा।
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