न्याय में देरी का शोर, पर सच्चाई कुछ और- न्यायपालिका पर नया दृष्टिकोण
भारतीय न्याय व्यवस्था पर प्रचलित भ्रांतियों और वास्तविकताओं के बीच का अंतर समझना आज बेहद ज़रूरी है। इस लेख के जरिए लेखक संजीव जैन ने अपने 33 साल के न्यायिक सेवा के अनुभव से इस जटिल विषय पर संतुलित दृष्टि प्रस्तुत की है। ये लेख न्याय में देरी के शोर के बीच सच्चाई, ज़िम्मेदारी और […]
भारतीय न्याय व्यवस्था पर प्रचलित भ्रांतियों और वास्तविकताओं के बीच का अंतर समझना आज बेहद ज़रूरी है। इस लेख के जरिए लेखक संजीव जैन ने अपने 33 साल के न्यायिक सेवा के अनुभव से इस जटिल विषय पर संतुलित दृष्टि प्रस्तुत की है। ये लेख न्याय में देरी के शोर के बीच सच्चाई, ज़िम्मेदारी और सुधार की दिशा तलाशता है।

जब 1988 में रोहतक से दिल्ली आकर वकालत शुरू की और 1992 में दिल्ली न्यायिक सेवा में प्रवेश किया, तभी से यह सुनता आ रहा हूँ कि भारतीय न्याय व्यवस्था मुकदमों के बोझ तले ढहने वाली है। पिछले चालीस वर्षों से यही स्वर कभी संसद से सड़कों तक, कभी अख़बारों से टेलीविज़न तक गूँजता रहा है।
राजनेता, न्यायाधीश, पत्रकार और बुद्धिजीवी — सभी इस विषय पर अपने-अपने अंदाज़ में चिंता जताते रहे हैं कि भारत में न्याय मिलने में वर्षों लगते हैं। “न्याय में देरी, अन्याय के समान है” — यह बात सर्वमान्य है, और इसी के साथ “तारीख़ पर तारीख़” जैसे फ़िल्मी संवादों ने जनता के मन में एक स्थायी छवि गढ़ दी कि अदालतों में फ़ैसले पाना कठिन है।
सच और सवाल
सच है कि बहुत-से मुकदमों में वर्षों लग जाते हैं। जल्द न्याय मिले — यह हर नागरिक की आशा और संविधान की अपेक्षा भी है। देरी के परिणाम गंभीर हैं — इसमें कोई विवाद नहीं। परंतु सवाल यह है कि इस देरी का असली ज़िम्मेदार कौन है? क्या इसके समाधान के लिए कभी ठोस और दीर्घकालिक कदम उठाए गए? क्या हर मुकदमे में सचमुच वर्षों लगते हैं? और क्या इस विषय पर कभी गहराई से, निष्पक्ष भाव से बात हुई है?
विश्वास और भ्रम
धीरे-धीरे एक ऐसा माहौल बन गया — या बनाया गया — जिसमें आम आदमी का न्याय और क़ानून पर से विश्वास कमज़ोर पड़ता गया। फ़िल्मों और मीडिया ने इस अविश्वास को और गाढ़ा किया। पर क्या यह सही है कि पूरी न्यायपालिका को देरी और निष्क्रियता की छवि में बांध दिया जाए?
प्रश्न अनेक, उत्तर कम
क्या विधायिका या कार्यपालिका ने कभी यह बताया कि नया क़ानून बनाते समय कितनी नई अदालतों की आवश्यकता होगी और उसके लिए धन की व्यवस्था कैसे होगी? क्या कभी जनता को यह साफ़-साफ़ बताया गया कि एक वर्ष में कितने मुकदमे निपटे और कितने नए आए? क्या किसी ने सरल भाषा में यह समझाने का प्रयास किया कि औसतन दो या तीन वर्षों में कितने प्रतिशत विवादों का निपटारा होता है? यदि जनता को पूरी तस्वीर ही नहीं बताई जाती, तो भ्रम फैलना स्वाभाविक है। न्यायपालिका स्वयं जनता को उसकी ही भाषा में क्यों नहीं समझा सकी — यह भी एक गंभीर प्रश्न है।
तथ्य बनाम धारणा
क्या यह सही नहीं है कि लगभग 60 से 70 प्रतिशत मामलों का निर्णय अब भी दो या तीन वर्षों के भीतर हो जाता है? फिर भी न्याय व्यवस्था की नकारात्मक छवि क्यों फैलाई जाती है? कौन-से तत्व हैं जो जनता के मन में यह विश्वास बैठाना चाहते हैं कि अदालतें निष्प्रभावी हैं? क्या यह नैरेटिव उन लोगों के हित में नहीं है जो न्याय से डरते हैं — भ्रष्ट, शक्तिशाली या स्वार्थी तत्व?
हर मामला दस–बीस साल नहीं चलता, पर जनता के मन में ऐसा डर बैठा देना कि न्याय मिलना असंभव है — यह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है।
इससे एक ओर तो अपराधियों और दबंगों के हाथ मज़बूत होते हैं, और दूसरी ओर युवा वकीलों तथा आम नागरिकों का मनोबल गिरता है। अगर सिविल विवाद अदालतों तक आने से कतराने लगेंगे, तो समाज में अराजकता और निजी शक्ति का दबदबा बढ़ेगा।
डेटा, शोध और उत्तरदायित्व
क्या किसी ने पिछले दो दशकों के आँकड़ों पर गंभीर अनुसंधान किया है? क्या किसी empirical study में यह देखा गया है कि कौन-से क्षेत्र या श्रेणियाँ सबसे अधिक प्रभावित हैं?सिर्फ असफलताओं का शोर मचाना और सफलताओं पर मौन रहना — जनता और लोकतंत्र — दोनों के हित में नहीं है।
न्याय व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने की ज़िम्मेदारी जिन संस्थाओं और व्यक्तियों पर है, वे अपनी भूमिका से बच नहीं सकते।
न तो किसी ने कानून बदलने से रोका है, न अधिक न्यायाधीश नियुक्त करने से, और न ही बेहतर व्यवस्थाएँ स्थापित करने से। यदि सुधार की गुंजाइश है, तो उस पर ठोस कदम उठाना ही वास्तविक समाधान है — न कि निराशा फैलाना।
नैरेटिव का प्रभाव
“Judicial system is going to collapse due to workload and delays” — इस प्रकार के वक्तव्य जनता के मन में न्याय के प्रति दूरी बढ़ा रहे हैं। यह नैरेटिव सिविल विवादों को अदालतों से दूर कर रहा है और अनौपचारिक दबाव-तंत्रों को बढ़ावा दे रहा है। यदि ऐसा चलता रहा तो यह न केवल न्यायपालिका, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर भी प्रहार होगा।
आवश्यक पहल
आज आवश्यकता है कि जनता को सत्य, संपूर्ण और पारदर्शी जानकारी दी जाए। न्यायपालिका और वकील समुदाय को मिलकर यह जिम्मेदारी उठानी होगी कि जन-विश्वास मज़बूत रहे। कमियों को छिपाया नहीं जाना चाहिए, परंतु उपलब्धियों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। किसी भी प्रकार के अंध-विरोध या अंध-समर्थन से बचना होगा।
सच्चाई यह है कि न्याय व्यवस्था को बेहतर बनाना किसी एक संस्था की नहीं, बल्कि हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। सच जानिए, सच मानिए — और सच में न्याय को सशक्त बनाइए।
(लेखक संजीव जैन दिल्ली न्यायिक सेवा में लगभग 33 वर्षों तक कार्यरत रहे और हाल ही में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश से सेवानिवृत्त हुए। वे न्याय और मानवीय संवेदना के गहरे अध्येता हैं। एक संवेदनशील कवि और चिंतनशील लेखक के रूप में उनकी रचनाएं अनुभव और मनुष्यता का संगम हैं।)
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