एक पुत्र की यात्रा: बचपन, पारिवारिक संतुलन और माता-पिता के प्रति समर्पण

पुत्र होना केवल एक संबंध नहीं, बल्कि कर्तव्य, त्याग और अदृश्य संवेदनाओं से बुना हुआ एक जीवन-पर्यंत का सफर है। इस विषय पर दिल्ली के मशहूर गंगाराम अस्पताल में बेहोशी के चिकित्सक डॉ. भुवन चंद्र पाण्डेय ने विस्तृत लेख लिखा है। ‘पुत्र’ शब्द की शास्त्रीय परिभाषा से लेकर व्यावहारिक जीवन के विभिन्न पड़ावों, युवावस्था का […]

पुत्र होना केवल एक संबंध नहीं, बल्कि कर्तव्य, त्याग और अदृश्य संवेदनाओं से बुना हुआ एक जीवन-पर्यंत का सफर है। इस विषय पर दिल्ली के मशहूर गंगाराम अस्पताल में बेहोशी के चिकित्सक डॉ. भुवन चंद्र पाण्डेय ने विस्तृत लेख लिखा है। ‘पुत्र’ शब्द की शास्त्रीय परिभाषा से लेकर व्यावहारिक जीवन के विभिन्न पड़ावों, युवावस्था का मार्गदर्शन, आजीविका का दबाव, विवाह के बाद माता और पत्नी के बीच संतुलन की चुनौती, तथा पिता बनने के साथ बढ़ती जिम्मेदारियों को यह लेख बहुत ही आत्मीयता से रेखांकित करता है। इसके साथ ही, माता-पिता की वृद्धावस्था में उनकी देखभाल, स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता और उनके चले जाने के बाद मन में रह जाने वाली अपूर्ण इच्छाओं के शूल को भी यह रचना गहराई से छूती है।

।। पुन्नाम् नरकात् त्रायते इति पुत्रः ।।

‘पुत्’ नामक नरक से रक्षा करता है वह ‘पुत्र’ कहलाता है। (जो माता-पिता और पूर्वजों की अपने कर्मों, वंश वृद्धि और तर्पण-पिंडदान आदि के द्वारा नरक जैसे कष्टों से रक्षा करता है)

अपनी माता के गर्भ में नौ महीनों तक बढ़ते रहने के बाद, birth लेकर शारीरिक तौर पर तो पुत्र अलग हो जाता है, पर कुछ अदृश्य तंतुओं से वह इस अनूठे संबंध से जीवन भर जुड़ा रहता है। संतान के जन्म लेते ही माता-पिता की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं और अब बहुत से कार्य पुत्र-केंद्रित रहते हैं। माता के त्याग एक तरह के हैं व पिता के त्याग कुछ अलग, पर दोनों ने ही अनेकों बार पुत्र के लिए अपने जीवन की बाजी लगाई है। पवित्र भारत भूमि पर पुत्रों के त्याग की भी न जाने कितनी गाथाएं इतिहास में अमर हैं। अब वो चाहें पिता की इच्छा के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत करने की भीष्म प्रतिज्ञा हो या फिर पिता का वचन निभाने के लिए चौदह वर्ष का वनवास। मर्यादा के शिखर पर मणि के समान चमकने वाले भगवान श्रीराम, जो एक दिन बाद ही सम्राट के सिंहासन पर विराजने वाले थे पर उन्हें मिला चौदह वर्षों का वनवास, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया और माता कैकेयी से कहा –

सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी॥

तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा ॥

(श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड ४१, ४)

(हे माता! सुनो, वही पुत्र बड़भागी है, जो पिता-माता के वचनों का पालन करने वाला है। आज्ञा पालन द्वारा माता-पिता को संतुष्ट करने वाला पुत्र, हे जननी! सारे संसार में दुर्लभ है।)

श्रवण कुमार के द्वारा की गई माता-पिता की सेवा आज भी प्रासंगिक है और यदा-कदा ऐसे उदाहरण वर्तमान में भी देखने को मिल जाते हैं। आज भी मुझे याद है जब एक पुत्र ने कोरोना काल के समय सघन चिकित्सा कक्ष में दाखिल हुई अपनी वृद्ध माँ को छोड़कर घर वापस जाने से साफ-साफ मना कर दिया था। उसने आँख में आँख मिलाकर साफ शब्दों में कहा था– ‘माँ को साथ लेकर ही जाऊंगा’। उस पुत्र के शब्द तो साधारण थे पर भाव बहुत दृढ़।

इस जीवन में लाड़-प्यार से भरे प्रारंभ के कुछ वर्षों (बचपन) की मौज-मस्ती और पढ़ाई के बाद सारी जिम्मेदारी उसी को उठानी पड़ती है, और बड़ी बात यह है कि यह बातें न वह किसी से कह सकता है, और न ही कोई सुनना चाहता है। बहुत से मेरे मित्रों व सहकर्मियों ने अपने मन की बातें मेरे साथ साझा कीं, जिसे मैं रसोई में माँ के द्वारा दी गई एक ज्योने (भोजन थाल) की सजी हुई थाली के समान परोस रहा हूँ –

युवावस्था का समय

युवावस्था में कदम रखते ही जैसे दिशा-निर्देशों की बाढ़ सी आ जाती है, और दशों दिशाओं से पैने-पैने शब्द व कई बार तो भीतर तक चुभने वाली फटकार सुनने को मिलती है, जिसे मैंने या मेरी आयु के लोगों ने अनगिनत बार सुना है। इधर-उधर मत जाओ, ये फालतू की बातें बिल्कुल मत करो, समय का सदुपयोग किया करो, अगर पढ़ोगे नहीं तो क्या करोगे? जो कुछ भी हम कर रहे हैं वो सब तुम्हारे लिए है, हमारे लिए नहीं। ये भाषा सही नहीं है, तुम गलत दोस्ती में पड़ रहे हो, ये साधारण सी बात भी तुम्हारी बुद्धि में क्यों नहीं जाती है। अभी तुम बहुत छोटे हो, ये बड़े लोगों की बातें हैं, तुम्हें इन बातों में कोई मज़ा नहीं आना चाहिए। पढ़ना और अच्छा करना तुम्हारे भविष्य के लिए है, अच्छा करोगे तो अच्छी नौकरी मिलेगी, और फिर लोगों से सम्मान पाओगे।

इस समय में होता है माता-पिता के साथ एकतरफा संवाद और अपेक्षा रहती है कि पलट कर कोई उत्तर न मिले, कई बार पिता के उग्र स्वभाव व क्रोध के कारण, मैंने कई लोगों को अपने अंदर की आग दबाते देखा है, जिसे माता जी के समझाने से ही कुछ शांति मिलती है। कुल मिलाकर निरंतर मिलते हुए दिशा-निर्देश, डांट एवं नोंक-झोंक व तनातनी तो आमतौर पर चलती है, पर जब कुछ सीमा पार हो जाती है तो अनेकों बार घर का माहौल तो गर्मा-गर्म समोसे जैसा हो जाता है।

फिर भी अगर शांति बनी रहती है तो केवल उस घर में निहित संस्कारों के कारण, जिसमें माता जी व बहन बहुत बड़ा किरदार निभाती हैं, जो उनके साथ बीच-बचाव से व कोमलता से वार्तालाप करके मामला ठीक कर देती हैं।

वरना तड़क-भड़क वाली सभ्यता के प्रभाव में तो वे शुरुआती दौर में ही लड़ कर अलग हो जाते हैं और एकाकी व बिना नियंत्रण का जीवन बिताते हैं, उन्हें अच्छे-बुरे का कोई ज्ञान नहीं होता है और उन्हें सही मार्गदर्शन दिखाने वाला भी कोई नहीं होता है। हमें यह ज्ञान होना चाहिए कि युवा जीवन ऊर्जा से भरा होता है इसलिए तेज़ चल सकता है, पर सही मार्ग का पथ-प्रदर्शन तो हमारे वरिष्ठ ही कर सकते हैं, क्योंकि वे उस पर चल चुके हैं।

नौकरी लगने के पश्चात

पैसा कमाने और उसको खर्च करने का सुझाव शुरुआत से ही मिलने लगता है। ऐसे करो-वैसे करो, तुम कम में काम चलाया करो ताकि भविष्य के लिए कुछ जमा कर लो। कई बार तो लगता है कि कुछ तो वर्तमान में भी खर्च करना चाहिए, यह समय तो चल रहा है भविष्य किसने देखा है?

पुत्र से सबको ऐसी उम्मीद लगती है कि वो कितना भी पैसा घर वालों या किसी को देता है तो भी सबको यह उम्मीद रहती है कि उसका पैसा समाप्त ही नहीं होगा। जबकि उसकी आय भी सीमित है जो जी-तोड़ मेहनत से ही मिल पाती है।

फिजूल या उल-जलूल कार्यों में या कितना ही पैसा खर्च कर दो वह कभी पूरा नहीं हो पाता है, धीरे-धीरे यह समझ में आने लगता है कि स्वयं ही व्यय की सीमा रेखा तय करनी पड़ती है। जिस भी महीने में सीमा से बाहर पैसा बहाया, हर बार किल्लत का सामना करना पड़ा, फिर धीरे-धीरे समय नियंत्रण करना सिखा ही देता है।

विवाह के उपरांत

विवाह के तुरंत बाद से ही पुत्र की अगली कठिन परीक्षा का आरंभ हो जाता है, और वो किसी जिम्मेदारी की वजह से नहीं बल्कि माँ और पत्नी के बीच में सामंजस्य बैठाने की कलाकारी को लेकर होती है। और यह सूक्ष्म क्रिया सब पुत्रों के जीवन में कुछ न कुछ तनाव तो ले ही आती है, अंतर केवल इतना है कि कोई समझ लेता है और कोई झुंझला जाता है।

एक मित्र ने बताया कि उसकी माता जी पढ़ी-लिखी थीं पर नौकरी नहीं करती थीं, पर उसकी आधुनिक पत्नी पढ़ी-लिखी है और नौकरी करके पैसा भी कमाती है। एक बार होटल में बने खाने को लेकर कहा-सुनी हो गई, माँ कहती एक हजार रुपये केवल इतने से खाने के वो भी कैसे बनाया है पता नहीं, ये फिजूल खर्च है। जबकि पत्नी का कहना था कि इतनी मेहनत करके पैसा कमा रही हूँ क्या इतना भी नहीं कर सकती हूँ। दोनों अपनी सोच व परिस्थिति के अनुसार सही हैं, पर मैं क्या करूँ? किसी के भी पक्ष बोलूँ, दूसरा नाराज होगा, माँ को इस बात का दुःख होता है कि जिस पुत्र के लिए जीवन भर मेहनत की, वो उसकी अवहेलना कर रहा है, और नई बहू इस बात पर मुँह फुला लेती है कि मैं सब कुछ छोड़कर तुम्हारे पास आई हूँ, और तुम भी मेरी बात नहीं सुन रहे हो, ‘मैं तुमसे बात नहीं करूंगी’।

ऐसे में वो करे तो क्या करे? दोनों में सामंजस्य बिठाना आसान नहीं है। कई बार जब सामंजस्य बिल्कुल नहीं बैठता, तो रोज़मर्रा की किट-किट से परेशान होकर वे अलग हो जाते हैं।

माता जी को प्रेम भरे कोमल शब्दों में परन्तु पत्नी को कभी प्रेम व कभी कठोर शब्दों में समझाना चाहिए जिससे कि दोनों एक-दूसरे को समझें व सामंजस्य व आपसी सौहार्द बना रहे।

नई पीढ़ी की बहू क्या पहनेगी, क्या नहीं? इस बात पर तो लगता है शताब्दियों से बहस चली आ रही है। नई पीढ़ी अपनी हनक में रहती है और पुराने पहनावे को दकियानूसी मानती है और पुरानी पीढ़ी उन नये जमाने के कपड़ों को ओछापन, ये बहस लगता है हमेशा से चली आ रही है। कई बार दोनों के बीच में पुत्र बिना मतलब के ही असमंजस की स्थिति में फँस कर रह जाता है, जबकि किसी भी प्रकार के पहनावे से उसे कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा होता है।

कई बार तो इतनी मेहनत व भाग-दौड़ के बाद और घर में माँ व पत्नी के बीच में संतुलन बनाने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे उसका अपना कोई अस्तित्व ही नहीं है। दोनों ही तरफ से सुनना उसके जीवन का नित्य कर्म है, अब दोनों पलड़ों को बराबर भार देकर संतुलित रख पाना उसकी बुद्धिमत्ता व विवेक पर निर्भर करता है।

जितने भी लोगों से बात की, तो पाया कि रोजगार के लिए भागते लगभग सभी पुत्रों ने एक स्वर में बोला कि नौकरी करने के बाद चाहें जितनी भी थकाई लग जाए, पर जब घर पहुँचे तो अपनों के हाथ से एक पानी का गिलास व छोटी सी मुस्कुराहट ही थकान दूर करने के लिए काफी होती है। पर जब घर पहुँचते ही क्रोध से भरा चेहरा, अहं और दुत्कार से भरी वाणी और शिकायतों का पहाड़ टूट पड़े तो घर पहुँचने का सारा मज़ा व उत्साह ही समाप्त हो जाता है। ऐसा बड़े नगरों के व्यस्त घरों में ज्यादा होता है। जिन घरों में यह लगातार होता रहता है, उस घर में कमाने वाले पुत्र के जीवन की जीवटता और कुछ अच्छा करने का मन ही खत्म हो जाता है।

परिवार का विस्तार

परिवार के बढ़ने के साथ जीवन में एक नई ऊर्जा का संचार, उत्साह व एक अनोखा बदलाव तो आता ही है, माता-पिता बनने का सुख अलग ही होता है। लेकिन धीरे-धीरे जिम्मेदारी भी कई गुना बढ़ जाती है जिसका एहसास उसे कुछ समय बाद होता है। अब उसके दायरे में आती है माता-पिता, पत्नी, संतान, परिवार, कुल व समाज के प्रति विभिन्न तरीके की जिम्मेदारी।

एक पुत्र जब पिता बनता है तो मन प्रसन्न तो होता ही है पर उसका कार्य क्षेत्र कई गुना बढ़ जाता है। स्वयं का पुत्र होने पर पिता की पदवी प्राप्त होती है और धीरे-धीरे उसे यह भान होने लगता है कि हमें बड़ा करने का जो कार्य मेरे पिता इतनी सरलता से कर लेते थे, वह बिल्कुल भी आसान नहीं है।

समय के साथ उसे यह पता चल जाता है कि उसे अब पुत्र का भी धर्म निभाना है और पिता का भी। अगली पीढ़ी के पुत्र को खेत की नई पौध के समान ही कोमल हाथों की देख-रेख व पोषण की आवश्यकता होती है। बच्चों को कम समय देने के कारण उनका पोषण प्रभावित होता है जिससे उनके शारीरिक व मानसिक विकास पर असर पड़ता है। ये बात बहुत से लोगों को तब समझ में आती है जब समय हाथ से निकल जाता है।

बच्चों के संस्कार कभी भी दुकान या ई-शॉपिंग से नहीं खरीदे जा सकते हैं। वे घर व समाज से बचपन में ही सीखे जाते हैं और मानस पटल पर छप जाने के बाद जीवन भर जिए जाते हैं।

आमतौर पर थोड़े से समय का व्यवहार देखने पर ही बहुत से बच्चों की परवरिश का पता चल जाता है।

नौकरी निभाने के बाद देर से घर पहुँच कर पत्नी अपने शिशु को उसकी गोद में रख कर स्वयं सो जाती है, क्योंकि वो दिन भर भाग-भाग कर थक चुकी होती है। अब ये नया-नया बना पिता देर तक जागता है, फिर सवेरे-सवेरे नौकरी पर भागता है। ऐसे में कई बार मैंने केवल इसलिए लोगों को रात्रि की ड्यूटी करते देखा है, कि कम से कम कुछ बैठने को तो मिल जाएगा, वरना घर पर तो लगातार काम ही करना पड़ेगा। बड़े शहर में छोटे परिवार का होना सामान्य बात है, जहाँ माता-पिता या कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति नहीं होता है। काम करने वाले कभी भी उस जिम्मेदारी व भाव से कार्य नहीं कर सकते, जैसे कि माता-पिता या घर का कोई सदस्य। ऐसे में उन्हें एक माता-पिता की जरुरत का एहसास होता है जो उन्हें शारीरिक व मानसिक शांति के साथ-साथ, उचित देख-रेख की बातें बता कर उन्हें वर्तमान के लिए सहज व भविष्य के लिए आश्वस्त कर दे।

माता-पिता के वृद्ध हो जाने पर

जरा (वृद्धावस्था) की अवस्था से कौन बच पाया है, हमारे वृद्ध होते माता-पिता किसी न किसी प्रकार से अपनी पीढ़ी पर आश्रित होने लगते हैं। पुत्र कुछ न कुछ समय देकर व जरुरत का सामान लाकर माता-पिता को आराम देना चाहता है। कई बार समयाभाव या किसी और कारण से हर बार, हर समस्या या कार्य पूर्ण नहीं होने पाता है जिसके कारण मन में वो बात कुंडली की तरह बैठ जाती है।

मेरे मन में भी ऐसा ही है, माता जी ने एक कुछ ऊँचा पटला लाने की बात मुझसे कही थी, पर किसी न किसी कारण से मैं वो नहीं ला पाया, ये चीज़ न तो दुर्लभ थी न ही मेरी पहुँच के बाहर, पर अनेकों कारणों से यह नहीं हो पाया, कभी घर पर देर से पहुँचा, कभी हाट बंद थी या कभी भूल गया। उसी दौरान पूज्य पिता जी संसार से चले गए और फिर तेजी से माता जी का स्वास्थ्य बिगड़ता चला गया और फिर उन्होंने हमसे विदा ले ली।

पर आज दशकों बाद भी मैं ये बात नहीं भूल पाया हूँ, और यह बात आज मुझे एक शूल की तरह चुभती है, पर समय के आगे किसकी चली है। अब यह चुभन शायद मेरे शरीर के रोम-रोम में तब तक वास करेगी, जब तक यह शरीर स्वयं ही पंचतत्त्व में विलीन नहीं हो जाता। शुभ व जरुरी कार्यों में देरी न करने में ही भलाई है, क्योंकि समय निकल जाने पर मन में केवल एक खटका ही रह जाता है।

एक प्रिय मित्र की वृद्ध माता जी जो कि अनेकों शल्य चिकित्सा के प्रकरणों से गुजर चुकी थीं, और चोट से बचने के लिए शरीर को संतुलित करके चलना उनके लिए आवश्यक था। जब उसने कहा कि आप बिस्तर से उठते समय, फिजियोथेरेपी वालों के अनुसार, आराम से व धीरे-धीरे उठा करें, पर शायद कुछ कठिन शब्दों में, तो वे क्रोधित हो गईं। कुछ समय बाद उन्हें इस बात का आभास भी हुआ और वे निर्देशों के अनुसार, धैर्य के साथ व सहारा लेकर चलने लगीं।

वृद्धावस्था में जल्दी क्रोध आना स्वाभाविक है, पर स्वास्थ्य संबंधी दिशा-निर्देश मान लेने में सभी की भलाई है। बच्चों को चाहिए कि उन्हें निर्देश तो दें पर प्रेम भरे शब्दों से, वहीं दूसरी तरफ वृद्ध जनों को चाहिए कि उन जरुरी दिशा-निर्देशों की महत्ता को समझ कर मान लें, भले ही शुरुआत में दिखावे के लिए कुछ ना-नुकुर कर लें।

मेरे न जाने कितने ही मित्रों ने कहा कि माता-पिता अपने स्वास्थ्य के ऊपर बिल्कुल ध्यान नहीं देते हैं, और फिर एक दम से बड़ी परेशानी मुँह खोल के खड़ी हो जाती है। ऐसे में पूरा परिवार अस्त-व्यस्त हो जाता है। चाहे बच्चा हो या बुजुर्ग, अपने आप को हर संभव निरोगी रखना चाहिए, अगर कोई स्वास्थ्य संबंधी परेशानी है भी तो उसको एक सीमा तक सीमित रखना सभी की प्राथमिकता होनी चाहिए।

माता-पिता के चले जाने पर

प्रत्येक पुत्र अपने माता की प्रेम से बनाई हुई कम से कम एक-दो खाने की चीजों को कभी नहीं भूल पाता है। किसी ने बताया कि उनको अपनी माता जी के हाथ के बने दही-बड़े, किसी को पुलाव, छोले, दाल, मेथी-आलू की सब्जी, अजवाइन के पराठे या कोई और स्वादिष्ट व्यंजन बहुत पसंद था, और उनके जैसा कोई और नहीं बना सकता है। ये बात याद करते ही उनकी आँखें नम हो जाती हैं, चाहें वह स्वयं कितनी ही आयु का क्यों न हो।

जब तक माता-पिता जीवित रहते हैं, वह बहुत सी बातों से बेफिक्र रहता है, पर उनके परलोक वास करते ही उस पर एक अतिरिक्त दबाव आ जाता है। इस संसार से जब माता-पिता विदा हो जाते हैं, तो उनके जाने के साथ ही साथ ‘पुत्र’ नाम की इस अनूठी पदवी का भी समापन हो जाता है। अब उसका कोई और पद (जैसे पति व पिता) तो जीवित हो सकता है पर पुत्र का नहीं।

बहुत से लोगों को देखा, जो कि माता-पिता के जीवित रहते तो बिल्कुल सेवा नहीं करते, पर उनके जाने के बाद बड़ा सा शामियाना लगाकर भोज कराते हैं और बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। हालांकि लोगों को सब पता ही होता है, और उससे भी ज्यादा तो स्वयं उस पुत्र और पुत्रवधू को इस बात की अनुभूति अंदर से होती ही है। ऐसे लोगों को यह स्मरण रखना चाहिए कि वृद्धावस्था तो सभी के जीवन में आएगी, और जैसा आपकी संतान देखेगी वैसा ही वो आपके साथ भी करेगी।

पुत्र व पिता बनने का यह खेल हमारे सभ्य समाज में न जाने कब से निरंतर चला आ रहा है। हमारी उत्कृष्ट सामाजिक व्यवस्था के कारण ही पूरा परिवार एक इकाई की तरह रहता है, यहाँ पर स्त्री-पुरुष और सभी आयुवर्ग के लोगों के लिए सुरक्षा, सम्मान व परस्पर प्रेम की भावना निहित है। जिसमें प्रत्येक आयु के लोगों को एक-दूसरे का परस्पर सहयोग व मार्गदर्शन प्राप्त होता है, और इस प्रकार, इस जीवन यात्रा की प्रत्येक अवस्था को सहजता, उत्साह व प्रेमपूर्वक जिया जा सकता है।

‘जब रीति-रिवाज, संस्कार और पद्धति छूट जाती है तो सिद्धांत छूट जाते हैं और जब सिद्धांत छूट जाते हैं तो व्यक्ति निराधार हो जाता है, और निराधार व्यक्ति व उसका परिवार अपने समाज के उत्थान में क्या ही योगदान दे पाएगा जब उसका स्वयं ही कोई आधार नहीं है। ये एक चिंता का नहीं परन्तु चिंतन का विषय है।’

लेखक डॉ. भुवन चंद्र पाण्डेय, दिल्ली के प्रसिद्ध गंगाराम अस्पताल में बेहोशी (एनेस्थिसिया) के डॉक्टर हैं। ऑपरेशन टेबल पर मरीजों को रिलैक्स करने में उन्हें महारत हासिल है।