गठबंधन की सियासत में भरोसे की नई ईबारत लिख रहे अखिलेश यादव
बिहार चुनाव में अखिलेश यादव गठबंधन की राजनीति का नया चेहरा बनकर उभरे हैं। बिना एक भी उम्मीदवार उतारे, अखिलेश यादव ने स्वयं और समाजवादी पार्टी के संगठन को महागठबंधन के पक्ष में झोंक दिया। अखिलेश यादव का यह कदम गठबंधन की सियासत में सुखद उम्मीद जगाने वाला है। अखिलेश पहली बार ऐसा नहीं कर […]
बिहार चुनाव में अखिलेश यादव गठबंधन की राजनीति का नया चेहरा बनकर उभरे हैं। बिना एक भी उम्मीदवार उतारे, अखिलेश यादव ने स्वयं और समाजवादी पार्टी के संगठन को महागठबंधन के पक्ष में झोंक दिया। अखिलेश यादव का यह कदम गठबंधन की सियासत में सुखद उम्मीद जगाने वाला है। अखिलेश पहली बार ऐसा नहीं कर रहे हैं। वे पहले भी गठबंधन के सहयोगियों के पक्ष में उम्मीद और अपेक्षा से बढ़कर करते रहे हैं। हालांकि बदले में कई बार उन्हें धोखा और हक से कम मिला है। लेकिन बड़ा दिल दिखाते हुए अखिलेश यादव आखिर कैसे गठबंधन की सियासत की नई तस्वीर बना रहे हैं? पढ़िए समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश विधान परिषद में नेता विपक्ष रहे संजय लाठर का लेख।

राजनीति में जब शोर ज्यादा हो, सत्ताधारी दल की नफरत और विपक्ष के दमन की सियासत परवान पर हो, जब सियासत से सहयोग और मर्यादा का भाव लुप्त-सा होता जा रहा हो — ऐसे वक्त में बिहार चुनाव में बिना कैंडिडेट के अखिलेश यादव के ताबड़तोड़ प्रचार ने सियासत की नई भाषा और परिभाषा लिख दी है।
बिहार चुनावों में समाजवादी पार्टी का एक भी प्रत्याशी नहीं है, लेकिन पूरे चुनाव में अखिलेश यादव ने हजारों किलोमीटर की हवाई यात्रा की। बिहार के दर्जनों जिलों में महागठबंधन के उम्मीदवारों के प्रचार में पहुंचे। पांच दिनों तक 17 से अधिक रैलियां कीं। अखिलेश यादव बिहार में विपक्षी एकजुटता का चेहरा बन गए। उन्होंने दिखाया कि राजनीति सिर्फ सत्ता पाना नहीं है, बल्कि जनता की भलाई, लोकतांत्रिक मर्यादा और समाज में न्याय व समानता सुनिश्चित करने का माध्यम भी है।
बिहार चुनाव में अखिलेश यादव का मैदान में उतरना यह बताता है कि समाजवादी पार्टी के लिए राजनीति लोकतांत्रिक मूल्यों का विस्तार है। अखिलेश यादव उन समाजवादी लोकतांत्रिक सियासी मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें गठबंधन का अर्थ केवल सीटों की साझेदारी नहीं बल्कि सत्ता के विरोध की साझा जिम्मेदारी है।
अखिलेश यादव सिर्फ स्वयं ही चुनाव प्रचार में नहीं लगे, बल्कि विपक्षी एकजुटता की राह पर समाजवादी पार्टी के पूरे संगठन को झोंक दिया। बिहार में अखिलेश यादव ने पूर्णिया, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, पूर्वी चंपारण, सिवान, कैमूर, रोहतास, गया, नवादा, जमुई, बांका और भागलपुर जैसे जिलों में जनसभाएं कीं।
ये रैलियां केवल औपचारिकता नहीं थीं। हर सभा में जनता से संवाद किया। भाजपा की नीतियों पर सीधा प्रहार किया और गठबंधन की राजनीति को नया नैतिक आधार देने की कोशिश की। अखिलेश यादव के भाषण सीधे और लोकतांत्रिक मर्यादा से भरे रहे। उन्होंने अपने भाषणों में राज्य में परिवर्तन की जरूरत को अच्छे से समझाया।
समाजवादी पार्टी की राजनीति समरसता, समानता और अवसर के सिद्धांत पर आधारित है, जबकि एनडीए गठबंधन नफरत की सियासत की चैंपियन है। झूठे वादों के महारथी हैं। अखिलेश यादव ने बिहार में रोजगार की बात की, पलायन का दर्द बांटा, विभाजन और ध्रुवीकरण की राजनीति के खिलाफ ताल ठोंकी। उन्होंने बिहार की जनता से विकास की राह पर चलने के लिए परिवर्तन का आह्वान किया।
अखिलेश यादव की रैलियों का एक बड़ा उद्देश्य विपक्षी दलों में तालमेल बढ़ाना था। वे हमेशा साथियों से कहते हैं कि गठबंधन में सम्मान और मर्यादा का पालन सबसे बड़ी आवश्यकता है। गठबंधन टिकता तभी है जब उसके साझीदार एक-दूसरे के लिए त्याग करने का साहस दिखाएं। अखिलेश यादव ने कई बार कहा कि “गठबंधन में अहंकार नहीं, विश्वास होना चाहिए।” इस दृष्टिकोण के साथ वे नई सियासी लकीर खींचते हैं। वे व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक साझेदारी का बेहतरीन उदाहरण पेश करते हैं।
लोकतंत्र की रक्षा सिर्फ बड़ी-बड़ी बातों और लच्छेदार भाषणों से नहीं होती, बल्कि सियासी जमीन पर वास्तविक सहयोग दिखाना और करना दोनों पड़ता है। तेलंगाना के विधानसभा चुनावों में अखिलेश यादव ने के. चंद्रशेखर राव की पार्टी टीआरएस को अपना चुनावी रथ दिया। दक्षिण के राज्य में गठबंधन के सहयोगी को दी गई मदद विपक्षी एकजुटता की मजबूती के लिए अखिलेश यादव का विश्वास का जीता-जागता प्रमाण है।
बिहार की तरह पिछले विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने आम आदमी पार्टी के लिए भी प्रचार किया। कई रोड शो किए। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच मतभेद के बावजूद अखिलेश सामंजस्य बनाते दिखे। इसका असर भी दिखा। दिल्ली में बड़ी संख्या में यूपी के लोग रहते हैं। ऐसे में अखिलेश की सभा और रोड शो निर्णायक भी हुए। अगर यहां इंडिया ब्लॉक मिलकर लड़ता तो आज दिल्ली की तस्वीर कुछ और होती।
सियासी लाभ और सत्ता के लालच में कई बार सहयोगी दलों ने पहले समाजवादी पार्टी की ताकत का सियासी लाभ उठाया, फिर पाला बदल लिया। लेकिन अखिलेश गठबंधन का धर्म कभी नहीं भूले। वे हमेशा गठबंधन के सहयोगी दलों को उनके हक और हैसियत से ज्यादा देते रहे हैं।
2022 में राष्ट्रीय लोक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष को राज्यसभा के लिए समाजवादी पार्टी और आरएलडी का संयुक्त उम्मीदवार बनाया। आरएलडी के कम विधायक होने के बावजूद गठबंधन के सहयोगी को राज्यसभा की सीट दे दी। इससे आरएलडी की हैसियत बढ़ी। जयंत चौधरी राज्यसभा पहुंचे। लेकिन बाद में सत्ता के लालच में उन्होंने धोखा दे दिया।
इसी तरह, उत्तर प्रदेश में स्वामी प्रसाद मौर्या को विधानसभा चुनाव हारने के बाद एमएलसी बनाया। इस कदम से अखिलेश ने स्पष्ट संदेश दिया कि वे साथियों के साथ सिर्फ जीत में नहीं, बल्कि संघर्ष में भी खड़े रहते हैं। यह बताता है कि उनके लिए सत्ता नहीं, संगठन और साथी प्राथमिकता पर हैं।
उत्तर प्रदेश में ही देखें तो अखिलेश ने गठबंधन के साथियों के लिए त्याग किया। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस और एनसीपी को अपनी मजबूत सीटें दीं, जबकि वास्तव में देखा जाए तो इन सीटों पर सहयोगी दलों का कोई जनाधार नहीं था। अखिलेश इस कदम से त्याग का ऐसा उदाहरण पेश करते हैं जो गठबंधन की सियासत में शायद ही कभी देखने को मिले। उन्होंने हमेशा सीट से ऊपर सहयोगी दलों का सम्मान रखा। अखिलेश यह तब भी करते हैं जब कई बार सहयोगी दल के कुछ नेता उन्हें नीचा दिखाने की नाकाम कोशिश करते हैं।
ऐसा हुआ भी है। हरियाणा और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी की अनदेखी की गई। मध्य प्रदेश में कांग्रेस के नेता कमलनाथ और हरियाणा में कांग्रेस के नेता दीपेंद्र हुड्डा ने अखिलेश यादव को अपमानित करने वाले बयान तक दिए।
अखिलेश यादव गठबंधन के भीतर विरोध और निपटाने की सियासत नहीं करते। सत्ता की मौजूदा फांसीवादी सरकार का ताकत से विरोध उनकी प्राथमिकता है। कांग्रेस ने मध्य प्रदेश व हरियाणा में अखिलेश यादव का उपयोग न करके भारी भूल की। उनके स्थानीय नेताओं की “मैं” और “अहम” की राजनीति और अखिलेश यादव के ख़िलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी का खामियाजा कांग्रेस को इन चुनावों में उठाना पड़ा।
हालांकि अखिलेश यादव ऐसे नेताओं और उनके बयानों को विपक्षी गठबंधन की एकता के हित में कभी ध्यान नहीं देते। वे हमेशा विपक्षी एकता के लिए हर मुमकिन कोशिश करते रहते हैं। बिहार में राहुल गांधी ने जब वोट अधिकार यात्रा निकाली तो अखिलेश यादव उनमें सक्रियता से शामिल हुए। अखिलेश यादव जब कहते हैं कि “नफरत की राजनीति कभी विकास की राह नहीं दिखा सकती,” तो वे देश के मौजूदा माहौल में लोकतांत्रिक मूल्यों की फिर से स्थापना का संदेश देते हैं।
अखिलेश यादव “मैं” की सियासत नहीं करते, उनकी राजनीति “हम” की राजनीति है। गठबंधन को “मजबूरी” नहीं, बल्कि “ज़रूरत” मानते हैं। इसीलिए जब भी उन्होंने उत्तर प्रदेश में अपनी मजबूत स्थिति के बावजूद कमजोर मौजूदगी वाले बड़े दलों से लेकर छोटे दलों को सम्मान और पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया। जब भी उन्होंने विपक्षी एकता के लिए कदम उठाया, तो सहयोगियों को हक से ज्यादा दिया। कभी गठबंधन की सबसे मजबूत पार्टी होने के बावजूद उनका हक नहीं मारा। अपना दल (सोनेलाल) की पल्लवी पटेल, महान दल के केशवदेव मौर्य, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओमप्रकाश राजभर और निषाद पार्टी के संजय निषाद को जब भी अपने साथ जोड़ा, तो सम्मानजनक सीटें दीं।
मौजूदा बिहार चुनावों में अखिलेश यादव इस छवि को और बड़ा करते दिखते हैं। यहां वे किसी पार्टी के नेता नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रहरी की भूमिका में रहे। वे विपक्ष की मौजूदा सियासत के भीतर लोकतांत्रिक संस्कारों की रक्षा करने वाले नेता के रूप में उभरे हैं।
अखिलेश जब चुनावी मंच पर बोलते हैं, सहयोगियों से संवाद करते हैं या कार्यकर्ताओं से मुखातिब होते हैं, तो दिल से दिल की बात करते हैं। वे सामने वाले से सीधे कनेक्ट करते हैं, सीधी और सच्ची बात बोलते हैं। भारतीय जनता पार्टी के नैरेटिव बिल्डिंग के जवाब में नैरेटिव करेक्शन करते हैं। अखिलेश यादव ऐसे नेता हैं, जो सत्ता की झूठी सूचनाओं के पुरजोर शोर में भी सच्चाई की जोरदार जुबान बोलते हैं। वे मर्यादा और लोकतांत्रिक मूल्यों की एक मिसाल पेश करते हैं।
आज जब भारतीय जनता पार्टी की सियासत अधिक विभाजनकारी, फांसीवादी और धनबल पर आधारित हो गई है, ऐसे में इस सत्ता के मुकाबले में अखिलेश यादव का ईमानदार और निस्वार्थ प्रयास विपक्षी गठबंधन में एकता की धुरी बनाता है। गठबंधन की सियासत को एक दिशा दिखाता है। तय मानिए, अखिलेश यादव का यह प्रयास देश की सियासत से भारतीय जनता पार्टी के अंत की राजनीतिक भूमिका लिख सकता है।

(लेखक डॉ. संजय लाठर उत्तर प्रदेश विधान परिषद के विरोधी दल रह चुके हैं। समाजवादी नेता-विचारक हैं। समाजवादी चिंतन और आंदोलन पर आपकी लेखनी खूब चलती है। अखिलेश यादव की जीवनी “समाजवाद के सारथी” के लेखक हैं।)
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