दहेज़ अपराध, उत्तराधिकार अधिकार है, बेटियों को हक़ से वंचित न करें
बेटियां केवल परिवार की शोभा नहीं, बल्कि समाज की बराबरी की धुरी हैं। दहेज़ अपराध है, जबकि कानून उन्हें पैतृक और अर्जित संपत्ति में बराबरी का अधिकार देता है। समाज को तय करना होगा—क्या वह न्याय और अधिकार के पक्ष में है, या परंपरा और दबाव के? बेटियों को विरासत का अधिकार कानूनी भारतीय विधि […]

बेटियां केवल परिवार की शोभा नहीं, बल्कि समाज की बराबरी की धुरी हैं। दहेज़ अपराध है, जबकि कानून उन्हें पैतृक और अर्जित संपत्ति में बराबरी का अधिकार देता है। समाज को तय करना होगा—क्या वह न्याय और अधिकार के पक्ष में है, या परंपरा और दबाव के?
बेटियों को विरासत का अधिकार कानूनी
भारतीय विधि व्यवस्था बेटियों को पैतृक और अर्जित—दोनों प्रकार की संपत्ति में समान अधिकार प्रदान करती है। इसके विपरीत, दहेज़ एक दंडनीय अपराध है। फिर भी समाज में एक गहरी विडम्बना विद्यमान है— दहेज़ तो चलता रहता है, पर उत्तराधिकार के अधिकारों को अक्सर परिवारिक सद्भाव के नाम पर दबा दिया जाता है।
भावनात्मक दबाव से नकारते अधिकार
कई परिवार “दहेज़ दे दिया गया था” जैसे तर्कों के सहारे बेटियों के वैधानिक हिस्से को नकार देते हैं। बहनों को चुप कराने के लिए भावनात्मक हथियारों का सहारा लिया जाता है—रक्षाबंधन की दुहाई, संबंधों के बिगड़ने का डर, समाज की बातें। इस मनोवैज्ञानिक दबाव के चलते बेटियाँ अपने अधिकार से दूर होती जाती हैं और संवैधानिक समानता केवल कागज़ पर रह जाती है।
विरासत में अधिकार बराबरी का आधार
संपत्ति में हिस्सा न मिलना केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता की नींव पर सीधी चोट है। आर्थिक स्वतंत्रता ही महिलाओं को वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति देती है। जब बेटियां विरासत में अधिकार प्राप्त करेंगी, तब ही विवाह बराबरी के आधार पर टिक सकेगा और पारिवारिक संबंध अधिक न्यायसंगत बनेंगे।
समाज में सोच बदलना संस्थाओं की जिम्मेदारी
इस बड़े बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार करने की जिम्मेदारी केवल परिवारों की नहीं, बल्कि उन संस्थाओं की भी है जो समाज की सोच गढ़ती हैं—राजनीतिक नेतृत्व, धार्मिक मंच, शैक्षिक संस्थान, नागरिक समाज और मीडिया।
कानून और साहस से मिलेंगे अधिकार
समाधान स्पष्ट है: दहेज़ एक अपराध है। उत्तराधिकार एक अधिकार है। बेटियों को उनका हक़ मिलना ही चाहिए। इसे सुनिश्चित करने के लिए कानून का पालन, सामाजिक जागरूकता और परिवारों का साहस एक साथ काम करना आवश्यक है। केवल तभी बेटियाँ सशक्त और समान समाज का हिस्सा बन पाएंगी।
सशक्त बेटियों से ही समाज की प्रगति
बेटियां अपने अधिकारों के साथ सुरक्षित और स्वतंत्र हों, यही समाज की वास्तविक प्रगति है। समान संपत्ति अधिकार उन्हें आत्मनिर्भर बनाता है और दहेज़ जैसी कुप्रथा को समाप्त करता है। न्याय और समानता के बिना परिवार और समाज की नींव अधूरी रहती है।
(लेखक संजीव जैन दिल्ली न्यायिक सेवा में लगभग 33 वर्षों तक कार्यरत रहे और हाल ही में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश से सेवानिवृत्त हुए। वे न्याय और मानवीय संवेदना के गहरे अध्येता हैं। एक संवेदनशील कवि और चिंतनशील लेखक के रूप में उनकी रचनाएं अनुभव और मनुष्यता का संगम हैं।)
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