मृत होती संवेदनाएं, रिश्ते और संस्कारों से दूर होती हमारी नई पीढ़ी

अभिवादन शीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः। चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥ जो लोग नम्र विनम्र, सम्मान और प्रतिदिन बड़ों की सेवा करते हैं, वे लंबे जीवन, ज्ञान, प्रसिद्धि और शक्ति में वृद्धि के धनी होते हैं। पूरे जीव-जगत में सबसे ज्यादा विकसित बुद्धि, मननशीलता व भाव, शायद मानव में ही पाए जाते हैं। परंतु इस दुर्लभ […]

अभिवादन शीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः। चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥

जो लोग नम्र विनम्र, सम्मान और प्रतिदिन बड़ों की सेवा करते हैं, वे लंबे जीवन, ज्ञान, प्रसिद्धि और शक्ति में वृद्धि के धनी होते हैं।

पूरे जीव-जगत में सबसे ज्यादा विकसित बुद्धि, मननशीलता व भाव, शायद मानव में ही पाए जाते हैं। परंतु इस दुर्लभ व सर्वोत्कृष्ट मनुष्य देह को पाकर भी यदि संवेदनशीलता उत्पन्न नहीं हुई तो वह मानव ही क्या? ऐसे में भावहीन रोबोट और मानव में क्या अंतर रह गया। वह भाव ही तो है जिससे हम एक दूसरे के प्रति प्रेम व करुणा से भर जाते हैं। इन अगोचर भावों से ही तो रिश्तों का निर्माण होता है, ये रिश्ते चाहें जीव-जगत के साथ हो या उस सर्वशक्तिमान के साथ हो। जीव-जगत के भौतिक पदार्थों का इस भाव के जुड़ाव से कोई संबंध नहीं है, उस परमपिता को हमारी सतही दिखने वाली, यानी कि भौतिक उपलब्धियों से क्या सरोकार, उसे सरोकार है तो केवल हमारे मन में व्याप्त पवित्र भाव के अमृत रस से। जैसे-जैसे भाव गहरे होते जाते हैं, वैसे-वैसे उसकी भक्ति ऊँची उठती जाती है। हमारी उस सर्वशक्तिमान के प्रति निष्ठा, आस्था व भक्ति, इन सभी को गहरा समर्पण भाव चाहिए, क्योंकि भाव की गहराई सबसे परे है। साफ अर्थ है कि जहाँ भाव, वहाँ भगवान।

अगर हम वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बात करें तो आज बड़े नगरों में सभी व्यस्त हैं। समयाभाव के कारण एक दूसरे से मिलना कम होता है और एक दूसरे को ठीक से जान नहीं पाते हैं। जब हम एक दूसरे को कम जानते हैं तो बातें भी एक अनजान की तरह ही होती हैं, अंत में वह अदृश्य प्रेम का तंतु टूट जाता है। हाल ही में जब एक प्रौढ़ अवस्था प्राप्त मरीज की पत्नी से जब मरीज के बारे में कुछ प्रश्न किए, तो उसे ज्यादा नहीं पता था, जबकि उसकी बुजुर्ग माँ को विस्तृत जानकारी थी, फिर मैंने पत्नी की ओर देखा तो वो आँखें चुराने लगी थी। अर्थ साफ था कि उनमें गहरे लगाव की कमी थी, कुछ बातें तो शायद न पता हो, पर जब आधारभूत बातें ही नहीं पता, तो मतलब है कि आपस में मन नहीं मिल रहा है।

विचलित करने वाले भाव तो मन के महासागर में उत्पन्न होते ही रहते हैं, पर उन लहरों के पार चले जाना आसान नहीं है, बल्कि जीवन का सबसे कठिन युद्ध तो स्वयं के मन को जीतना है। हम अक्सर कोशिश करते हैं कि परिस्थितियाँ बदल जाएँ और हम सुखी हों, लेकिन यदि परिस्थितियाँ बदलने पर भी हम सुखी नहीं होते हैं तो इसका मतलब है कि क्रोध, लोभ, अहंकार, भय और चिंता ने मन में अपना घर बना लिया है। ऐसे में हम कोई भी दिशा अपना लें पर दशा नहीं सुधरेगी। उचित यही है कि अपने भीतर स्थापित नकारात्मक विचार को सकारात्मक करें। सकारात्मक विचार से जब अंतर्मन शांत होता है, तो वह छोटी-छोटी बातों से विचलित नहीं होता और जीवन-धारा सुंदर बनती है।

संस्कृति हमें जीवन जीने की दिशा देती है और बिना लिखित कानून बनाए यह भी बताती है कि किस प्रकार जीवन जिया जाये। हमारी पवित्र भारत भूमि जहाँ पुराने संस्कारों में नयी विचारधारा के संगम से निरंतर बदलाव होते रहते हैं और नयी धारा बनती है, हम पुरानी अच्छी बातों को लेकर और आधुनिक नयी सोच को साथ लेकर चलते हैं। यही कारण है कि रीति-रिवाज भले ही सदियों पुराने हो पर उनमें नयापन रहता है, जिससे नयी पीढ़ी भी जुड़ाव महसूस करती है। ऐसे अनूठे संस्कार जहाँ सभी के गुणों का पूर्ण सदुपयोग हो, और चहुमुखी विकास से पूरा समाज लाभान्वित हो।

पुरातन समय हो या आधुनिक काल, हमेशा से ही संवेदना का होना एक अहम विषय रहा है, पर अब धीरे-धीरे भोगवाद का पाश्चात्य प्रभाव दिखाई देने लगा है। संस्कार विहीन होने के साथ-साथ अब संवेदनाएँ भी क्षीण होने लगी हैं, और उसका कुप्रभाव भी दिखने लगा है। आजकल की परिस्थितियों में असंवेदनशीलता की ये कुछ ऐसी झलकियाँ हैं जिसे सामान्य तौर पर देखा व सुना जा सकता है।

समाप्त होती हृदय की संवेदनशीलता

कभी किसी घर में कोई असामयिक घटना या दुर्घटना हो जाये, तो घर-परिवार व सारा समाज एकत्रित होकर उन्हें सांत्वना देता व यथासम्भव सहायता प्रदान करता, जिससे वो परिवार टूटे नहीं। ऐसी परेशानियाँ तो किसी के भी जीवन में आ सकती हैं, पर अगर मन में सुरक्षा का एहसास है तो बड़े-बड़े झंझावातों से भी वह परिवार आगे निकल जाता है। ये सुरक्षा की भावना केवल उसे परिवार व समाज से ही मिल सकती है। आज भी बहुत से गाँवों में और न जाने कितने ही परिवारों में पैसा कमाने वाला व्यक्ति, जब किसी कारणवश प्राण खो बैठता है, तो भी वह परिवार भूखा नहीं रहता है क्योंकि सामाजिक ताने-बाने के कारण, वे जीवन यापन कर लेते हैं। समाज में कोई ऊपर तो कोई नीचे आता ही रहता है, पर अगर सबके जुड़ाव व उत्थान की सोच वाला समाज हो, तो व्यक्ति किसी भी संकट से निकल जाता है।

हम हमेशा सोचते हैं कि हमें कैसे लाभ मिले, पर अगर हम दूसरे को लाभ देंगे व सहायता प्रदान करेंगे तो दोनों ही परोक्ष या अपरोक्ष रूप से लाभान्वित होंगे।

कुछ समय पूर्व जब एक जानकार के संबंधी, सघन चिकित्सा कक्ष में दाखिल हुए तो सामाजिक नियमों को निभाने बहुत से लोग मरीज को देखने यहाँ आते जा रहे थे। लेकिन आश्चर्य इस बात का था कि 2-3 घंटे की इस मुलाकात में उनकी बातें सिर्फ दस मिनट की ही रही होंगी, वो भी एकदम सतही बातें। बाकी पूरे समय वे अपने मोबाइल पर वीडियो देखते रहे या फिर टाइप करके संदेशों को भेजते रहे, फिर अंत में कैंटीन जाकर जलपान किया और वहाँ से प्रस्थान कर गए। कुल मिलाकर देखा जाए तो ऐसे संवेदनशील समय में एक भी शब्द ऐसा नहीं था जो कि संवेदना से भरा हो, न सहायता के लिए हाथ बढ़ाया न किसी कार्य में सहयोग देने का आश्वासन दिया। हमें इस बात का भान होना चाहिए कि जब हमारे यहाँ ऐसी ही परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी, तो क्या बाकी लोग भी इसी प्रकार व्यवहार नहीं करेंगे? ऐसी परिस्थिति में एक दूसरे के प्रति व्यवहार कैसा हो, इसका उत्तर मैं आपकी बुद्धिमत्ता और विवेक पर छोड़ता हूँ। सामंजस्य, सहयोग, स्नेह और समरसता के कोमल धागे से ही कठोर परिस्थितियों को साधा जा सकता है और समाज को ऊर्ध्व दिशा दी जा सकती है।

अपराधबोध और मन की गहरी पीड़ा

वैसे तो न जाने कितने ही छोटे-मोटे पाप मैंने इस जीवन में किए होंगे, उन सभी का तो मुझे भान नहीं है। लेकिन कभी-कभी कुछ ऐसी बातें मन में बैठ जाती हैं जिसे इंसान कभी भुला नहीं पाता है। मुझे याद है कि जब मैं छोटा बच्चा था तो बिना किसी तनाव के कभी भी दौड़ कर घर के अंदर या बाहर भाग जाता था। घर में माताजी हमेशा ही रहती थी, और इसलिए कभी ऐसा मन में ही नहीं आया कि कभी किसी घर में ऐसा भी होगा कि उनके यहाँ माताजी घर पर नहीं मिलेंगी। कुछ बड़ा होने पर विवाह और फिर परिवार का विस्तार हुआ। जब हम पति-पत्नी दोनों ही नौकरी करने जाते तो विद्यालय जाती संतान को 1-2 वर्ष तक छोटे बच्चों के डे-केयर केंद्र में छोड़ देते थे। शनिवार को या किसी भी छुट्टी के दिन जब उसका विद्यालय बंद होता था, तब भी उसे शाम तक वहाँ हमारे आने का इंतजार करना पड़ता। जो हमारे बालक को बिल्कुल पसंद नहीं था, और मैं उसकी आँखों में घर जाने की आतुरता व विवशता के भाव को पढ़ पाता था, कई बार वो इस बात की शिकायत भी करता था। अंदर ही अंदर मेरा मन भी कचोटता, पर चाहकर भी मैं विवश था, और कुछ भी कर पाने में असमर्थ था। मुझे नहीं पता कि मेरा पुत्र मुझे इस अपराध के लिए कभी क्षमा करेगा या नहीं, पर मुझे इस बात का दृढ़ विश्वास है कि मैं अपने को इस बात के लिये कभी माफ नहीं कर पाऊँगा और पता नहीं कब इस अपराधबोध से निकल पाऊँगा।

कुछ समय बाद जब परिस्थितियाँ बदलीं, और वह घर पर खुश रहने लगा। डे-केयर का यह समय तो ज्यादा बड़ा नहीं था पर, उसकी आँखों से जब भी मैं बचपन देखता हूँ तो मुझे अपने बचपन का खुलापन याद आ जाता है। बच्चों को निर्भयता, सुरक्षा, स्वच्छंदता व प्रेम का वातावरण चाहिए ना कि माता-पिता का पैसा। बच्चों के कोमल मन में माता-पिता की उपस्थिति से सुरक्षा की अमूल्य अनुभूति अंकित हो जाती है जो जीवन पर्यंत उनके साथ रहती है। यह अंतर्मन का ठहराव व विश्वास उसके जीवन में बहुत ज्यादा महत्व रखता है ना कि उनके माता-पिता के ऊँचे-ऊँचे प्रमाण पत्र, उनका नाम या फिर उनकी विराट संपत्ति का ब्यौरा। लगभग डेढ़ दशक तक की आयु के बच्चों में संस्कार पिरोए जा सकते हैं, जीवन के इस काल खंड के निकल जाने पर उसको किसी की ज्यादा आवश्यकता नहीं होती है, परंतु संस्कार अंतिम साँस तक यथावत रहते हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त करने का लाभ तो तभी है जब हम अपने से ज्यादा स्वच्छ व सक्षम परिस्थितियाँ अगली पीढ़ी को प्रदान कर पाए, जिससे वे और उन्नतिशील होकर अग्र दिशा में आगे बढ़ें। जबकि इसके उलट आजकल हम बड़ी-बड़ी डिग्री लेकर और केवल धन कमाने की चाह में घूमते हैं और नयी पीढ़ी को कठिन बचपन दे रहे हैं जो उनके भविष्य के लिए घातक सिद्ध हो रहा है।

धन तो जरूरी है पर संतुलित रूप से अगर धन भी कमाया जाए और परिवार को भी साधा जाए, तब ही अगली पीढ़ी कुछ और अच्छा कार्य करेगी और उसके परिणाम सार्थक एवं दूरगामी आएँगे। न जाने कितने ही नव-युगल अपने बच्चों को अनजाने में कठिन बचपन दे रहे हैं।

कुछ वर्ष पूर्व हमारे भारत के सुदूर क्षेत्र से एक बुजुर्ग मरीज हमारे चिकित्सालय में किसी शल्य चिकित्सा के लिए आए, संज्ञा-विहीन करने से पूर्व कुछ देर बात करके ही मन प्रसन्न हो गया। कुछ दिनों के बाद मैंने उनसे उनका हाल-चाल लिया, कुछ देर बाद मैंने उनसे पूछा कि बाबूजी आपके बचपन व आज के बचपन में क्या अंतर है? तब उन्होंने कुछ सोचकर कहा-‘बचपन में जब हम गलती करते थे, तो हमें एक अपराध बोध होता था, पर आजकल के बच्चे गलती करने पर भी नहीं मानते हैं, और अपनी ही बात को सही साबित करते हैं।’ न तो अपराध का बोध है और ना ही उसे स्वीकार करने की क्षमता, इसलिए उनमें विवेक होना तो दूर की बात है। प्रत्येक पीढ़ी की सोच-विचार अलग होते हैं, पर यहाँ अंतर संस्कारों का प्रतीत होता है।

समाज व राष्ट्र के उत्थान या जनमानस की परेशानी को दूर करने में हम कैसे योगदान दे सकते हैं, इन जैसे कठिन विषयों पर अब बहुत कम लोग ही कोई विचार-विमर्श कर पाते हैं। जब मन ही भौतिक चीजों में लिप्त हो तो आगे क्या सोचेगा। इसलिए आश्चर्य की बात नहीं है कि आजकल गहरी बातें व साधारण चिंतन तो दूर की बात है, बहुत से माता-पिता अपनी संतान को ऐसी बातें बताते और सिखाते हैं कि कैसे भी करके उनकी संतान पेट भरने लायक कुछ सीख जाए।

मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं॥

रामचरितमानस, उत्तरकांड, ९९-४

भावार्थ यह है कि माता-पिता अपने बालकों को बुला कर वह बातें बताते हैं कि जिससे वे अपने पेट को भर सके।

पति-पत्नी के संबंधों में आपसी समझ

आजकल पति-पत्नी दोनों के पास समय की कमी रहती है और इसीलिए एक दूसरे की समस्याओं और जरूरतों को समझ नहीं पाते हैं। अगर बहुत सी बातों को अपनी इच्छानुसार ना करके दूसरे के इच्छानुसार किया जाए, तो तनाव से बचा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर एक व्यक्ति को अगर कोई विशेष व्यंजन पसंद है तो उसे दूसरे की पसंद का ध्यान रखकर उसके अनुरूप ही बनाना चाहिए जिससे कि पारिवारिक-सौहार्द्र बना रहता है। लेकिन दूसरे व्यक्ति का भी यह दायित्व है कि पहले वाले के पसंद-नापसंद का ख्याल रखें। इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है हमारी माँ, जो सबके पसंद और स्वाद का तो ध्यान रखती है, पर विडंबना यह है कि शायद ही किसी को ये पता होगा कि उनकी माँ को क्या पसंद है? पति-पत्नी के बीच में पूर्ण समर्पण व विश्वास बिल्कुल अडिग होना चाहिए, अनेकों बार हमारे मित्र व संबंधी हमें अलग-अलग राय देते हैं, कई बार वह सकारात्मक होती है और कई बार नकारात्मक। नकारात्मक प्रतिस्पर्धा आने से अधोगति निश्चित है, क्योंकि इसका प्रतिकूल प्रभाव हमारी मानसिकता पर जरूर पड़ेगा। इसलिए हम अच्छी संगति को महत्व देते हैं क्योंकि इससे अच्छे विचार आते हैं।

जैसा मन में विचार होगा वैसा ही व्यक्ति का व्यवहार होगा। जैसा व्यवहार होता है वैसा ही आचरण बन जाता है और फिर व्यक्ति जीवन में वैसा ही कार्य करता है, अंत में वही उसकी गति बन जाती है।

मरीज-चिकित्सक के बीच बढ़ता अविश्वास

जब भी कोई चिकित्सालय में प्रवेश करता है तो किसी न किसी स्वास्थ्य संबंधी बीमारी के कारण। कुछ मन परेशान होता है, और साथ ही साथ समय व पैसा लगता है, सो अलग। चिकित्सालय के किसी भी क्षेत्र में मरीज और चिकित्सक के बीच दूरियाँ बढ़ने लगी हैं। जिसका कारण आपसी सहयोग व विश्वास की कमी है। मरीज को लगता है ज्यादा दवाइयाँ और जाँचें लिख दी हैं और चिकित्सक कहता है जो आवश्यक हैं वो तो करने पड़ेंगे। कुछ लोग इंटरनेट में चार लाइन पढ़ कर ज्ञान बघारने लगते हैं। लेकिन उनको यह भी याद रखना चाहिए कि चिकित्सक का मुख्य कार्य ही चिकित्सा सेवा देना है, वो हमेशा ही बीमार लोगों से घिरा रहता है, और उसे पता है कि कैसे जाँच करनी है और कैसे इलाज प्रारंभ करना है, उसके क्षेत्र में दखल ना देना ही ठीक है।

एक दूसरे के प्रति विश्वास, सहयोग व सहनशीलता की कमी और जल्दी से उद्विग्न हो जाने के कारण अब इस रिश्ते में भी दरार आने लगी है। जब मैं महामारी कोविड के दौरान ड्यूटी पर था तब बहुत से लोगों, मरीजों व उनके रिश्तेदारों को शायद आपातकालीन विभाग में होने वाले कार्य व स्थिति का अंदाजा भी नहीं था। कुछ लोग बहुत परेशान हो रहे थे और कुछ लोग गुस्से में भी थे। सरल शब्दों में जब उनको सारी स्थिति दिखा कर विस्तृत रूप से समझा दी, तो जल्दी ही वे शांत हो गए।

मरीज को चिकित्सक की सीमाएँ समझनी चाहिए पर साथ ही साथ चिकित्सक को भी मरीज की स्थिति का भान होना चाहिए। तभी वे दोनों एक दूसरे को समझ पाएँगे और परस्पर विश्वास दृढ़ होगा।

वृद्धाश्रम और बदलते पारिवारिक संस्कार

जैसे-जैसे लालच बढ़ेगा, परिवारों में विघटन होगा, समाज का भी पतन होगा, जनसामान्य भी आमतौर पर सेवा, प्रेम व करुणा से दूर जाने लगेंगे और जिसका दूरगामी परिणाम हमें भुगतना ही होगा। आजकल पश्चिम की नकल और भोगवाद के चलते, हम अपने ही ‘सेवा परमो धर्मः’ के भाव को भूल रहे हैं, और अपने वृद्ध माता-पिता के साथ नहीं रह पा रहे हैं। और कई बार तो घर की अवस्था व आर्थिक स्तर ठीक होने के बाद भी कुछ लोग अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम में भेज देते हैं। यही कारण है कि आजकल इन वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ रही है, अपने जन्मदाता व पालन-पोषण करने वालों की उपेक्षा करना कौन सी भली नैतिकता है, अगर हम नहीं बदलते हैं तब हमें तैयार रहना होगा और समय आने पर इन आश्रमों में जीवन तलाशना पड़ेगा। किसी उचित कारण के होने पर तो शायद इसको तर्कसंगत ठहराया जा सकता है। पर एक सामान्य मानसिकता के लोगों के मन में जब यह घर करने लगे तो अर्थ है संस्कार को दोबारा खंगालने की व सुषुप्त मन को जगाने की जरूरत आन पड़ी है।

जिस पवित्र भारत भूमि पर श्रवण कुमार जन्म लेते हों और माता-पिता की सेवा को एक नयी ऊँचाई प्रदान करते हो, वहाँ पर ऐसी मानसिकता का आना दुर्भाग्यपूर्ण है। अपने बच्चों की बीमारी के समय माता-पिता को छुट्टी के लिए सोचने की जरूरत नहीं पड़ती है, पर यह विडंबना ही है कि वही माता-पिता जब वृद्ध हो जाते हैं तो उनके लिए छुट्टी लेना संतान को भारी पड़ता है। जिस पवित्र भारत भूमि में देवता स्वयं जन्म लेने के लिए लालायित रहते हों, उस देवस्थान तुल्य भूमि पर भी ऐसी निकृष्ट मानसिकता का प्रभावी होना एक चिंतन का विषय है। वृद्ध माता-पिता को पैसे या संपत्ति की चाह नहीं होती, उन्हें चाह होती है तो केवल इस बात की कि परिवार के साथ रहें व कुछ समय उनके साथ बिताएँ।

संवेदनहीनता और घटती मानवीय संवेदनाएँ

कभी-कभी जब दुर्भाग्य से कोई सड़क दुर्घटना घटित हो जाती है तो कई लोग घायल हो जाते हैं, ऐसे में बहुत से लोग तो उन अपरिचित घायलों को उपचार या चिकित्सालय में ले जाते हैं। आजकल बहुत से लोग मनोरंजन या किसी और प्रयोजन के लिए रील बनाते हैं, जिससे लोग उन्हें दो पल देखें और वाह-वाह कहें, वहीं पास ही किसी की जान पर बनी है। जो बिल्कुल भी ठीक नहीं है, असहनीय दर्द और जीवन के ऐसे संघर्ष व संवेदनशील समय ये उन व्यक्तियों की संवेदनहीनता को दर्शाता है। एक मानवतावादी मनुष्य ऐसा कदापि नहीं करेगा।

हमारी संवेदना और मानवीय भाव

प्रत्येक व्यक्ति की संवेदना का स्तर अलग ही होता है, इसका हमारे नाम व संपत्ति से कोई संबंध नहीं होता है। देश के एक बड़े अफसर जब भारत के गाँव की ओर निकले तो सादगीपूर्ण रहन-सहन व उनकी दिनचर्या देख रहे थे। जब वे एक आम के बाग के पास से गुजरे, तो कार में बैठे दोनों पति-पत्नी ने चिड़ियों के बहुत से घोंसले देखे। उनके मन को एक सुंदर घोंसला बहुत भा गया, उन्होंने सोचा कि क्यों न एक घोंसला अपने घर में सजाने के लिए पेड़ से उतार लें। तभी पास खेल रहे एक चरवाहे के बच्चे से कहा कि एक घोंसला पेड़ से उतार दे, उसने मना कर दिया। फिर उसे कुछ पैसे का प्रलोभन दिया गया, वो मना करता रहा और उसके पैसे बढ़ते गए, पर वो अडिग था कि किसी कीमत पर भी घोंसला पेड़ से नहीं निकालूँगा। तब अफसर ने उसे बुलाया और प्रेम से उसका कारण पूछा तो बच्चे ने साफ-साफ कहा ‘जब चिड़िया की माँ खाना लेकर वापस आएगी और घोंसला व नन्हे बच्चों को नहीं पाएगी तो मैं उसे क्या जवाब दूँगा।’ वो बहुत परेशान हो जाएगी, इसका पाप मैं अपने ऊपर नहीं लूँगा, मैं घोंसला नहीं निकालूँगा। अफसर साहब का हृदय यह उत्तर सुनकर सन्न रह गया। उनकी सारी की सारी डिग्रियाँ, पद व प्रतिष्ठा उस मवेशी चराने वाले के सामने कुछ भी नहीं रह गई। उत्तर सुनने के बाद उनके मन में आया कि इतना पढ़ने और नाम कमाने के बाद भी अगर किसी के प्रति संवेदना ही नहीं उत्पन्न कर पाए तो ऐसी पढ़ाई का क्या लाभ, वे आत्मग्लानि से भर गए और अपने अंतर्मन को खंगालने लगे थे। उन्हें आज जीवन का एक महत्वपूर्ण सबक सीखने को मिला था-वो भी गाँव के एक भोले-भाले बालक से।

जीवन में संतुलन और जड़ों से जुड़ाव

आसमान की सी ऊँचाई पर उड़ना किसे पसंद नहीं, पर जरूरी है कि उड़ते समय पाँव भूमि पर टिके रहें। इसका एक सुंदर उदाहरण है ‘पतंग’, जिस प्रकार पतंग आसमान में ऊँचाई पर उड़ती है, पर डोरी टूटते ही कुछ देर में भूमि पर पड़ी होती है। इसका अर्थ है ऊँचाई पर बने रहने के लिए जड़ों से जुड़े रहना जरूरी है। इसी प्रकार गाँव-परिवार हो या मित्रगण, इन सभी से जुड़कर आगे बढ़ने पर जो ऊँचाई प्राप्त होती है वो निरंतरता लिए हुए होती है।

चाहें डाँट हो या प्यार, लड़ाई हो या व्यवहार, धन कमाना हो या पद की लालसा, किसी के प्रति मान-सम्मान हो या अपमान, सब कुछ एक सीमा में ही ठीक होता है। अगर जीवन के किसी भी क्षेत्र में लंबी दूरी तक आगे बढ़ना है, तो जरूरी है संतुलन बनाकर दौड़ना और ठीक वेग में दौड़ना। सुघड़ धावक तो वो है जो किसी को धक्का मार कर या गिरा कर ना जाए, बल्कि अपनी योग्यता से आगे जाए, उसे ये भी पता हो कि कहाँ गति को धीमा करना है। अनियंत्रित वेग से चलने वाले लोग अक्सर टक्कर खाकर चोटिल हो जाते हैं या गहरी खाई में मुँह के बल गिर पड़ते हैं। आजकल दौड़ना तो सभी को आता है पर ‘रुकना कहाँ है’, ये हुनर कम ही लोग जानते हैं।

‘मन में सेवा भाव रख कर कार्य करना यह बताता हैं कि आप का अंतःस्थल सुखी, समृद्ध व संतुष्ट हैं।’

लेखक डॉ. भुवन चंद्र पाण्डेय, दिल्ली के प्रसिद्ध गंगाराम अस्पताल में बेहोशी (एनेस्थिसिया) के डॉक्टर हैं। ऑपरेशन टेबल पर मरीजों को रिलैक्स करने में उन्हें महारत हासिल है।