दूसरों से मिलने में मस्त हम, पर खुद से मिलने की लाइनें व्यस्त

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सब दूसरों से तो रोज़ मिलते हैं, पर खुद से मिलने का वक्त नहीं निकाल पाते। इसी आत्ममंथन की संवेदनशील यात्रा में लेखक सौरभ पाण्डेय हमें दिखाते हैं — कैसे जिम्मेदारियों, परिवार और समय की रफ्तार में “स्वयं” कहीं खो जाता है। यह लेख हमें ठहरकर खुद से […]

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सब दूसरों से तो रोज़ मिलते हैं, पर खुद से मिलने का वक्त नहीं निकाल पाते। इसी आत्ममंथन की संवेदनशील यात्रा में लेखक सौरभ पाण्डेय हमें दिखाते हैं — कैसे जिम्मेदारियों, परिवार और समय की रफ्तार में “स्वयं” कहीं खो जाता है। यह लेख हमें ठहरकर खुद से मिलने की जरूरत का एहसास कराता है।

आज प्रातः जब फोन खोला, वर्तमान के सभी शहरी लोगों की तरह मैंने भी व्हाट्सऐप ही खोला। मेरे एक मित्र ने एक संदेश भेजा था —“कभी खुद को फोन मिलाकर देखा है? इंगेज टोन सुनाई देगी… दूसरों से मिलने में सभी व्यस्त हैं, खुद से मिलने की सारी लाइनें व्यस्त हैं।”

इस संदेश को पढ़ते ही मैंने सोचा कि आज मित्र के इस संदेश को अमल में लाते हुए स्वयं से मिल लेता हूँ। आज का पूरा दिन मैं स्वयं के लिए रख लेता हूँ।

बचपन की यादें

मैंने अपना बचपन लखनऊ जैसे नगर से प्रारंभ किया। पिताजी उत्तर प्रदेश सरकार में कार्यरत थे और माताजी उच्च शिक्षित गृहिणी। मैं चार भाई–बहनों में सबसे छोटा और लाड़ला था। पिता के अंकुश और माता के ज्ञान के बल पर हम सभी ने अच्छी शिक्षा प्राप्त की। कम वेतन के बावजूद पिताजी ने कभी भोजन, फल या खेलकूद में कोई कमी नहीं होने दी। उन्होंने हमेशा हमें चकाचौंध की दुनिया से दूर रखा।

सरकारी नौकरी और चार बच्चों की परवरिश में तालमेल बैठाना उन्हें बखूबी आता था। आज हम चारों भाई–बहन अपने-अपने रोजगार और परिवार में व्यस्त और मस्त हैं, पर स्वयं से मिलने का समय किसी के पास नहीं है।

जिम्मेदारियों का जाल

मैं भी अपनी नौकरी, घर और बच्चों की जरूरतों में इतना व्यस्त हो चला हूं कि स्वयं से मिलना तो दूर, स्वयं के लिए कुछ कर पाने का भी समय नहीं है। समय की कोई कमी नहीं — पर फिर भी खुद के लिए समय निकाल पाना संभव नहीं हो पाता। परिवार के मुखिया की जिम्मेदारी ऐसा करने से रोक देती है।

जिस सरकारी नौकरी में हमारे पिता जी ने चार बच्चों का पालन-पोषण किया, आज की परिस्थितियों में उसी नौकरी से दो बच्चों की परवरिश भी कठिन लगती है। रोजमर्रा की दौड़-भाग में पसीने इस कदर छूट रहे हैं कि स्वयं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की भी चिंता नहीं रहती।

स्वास्थ्य और संकल्प

एक दिन पत्नी ने कहा — “मुझे डॉक्टर साहब से अपने रूटीन टेस्ट कराने के लिए लिखवाना है। क्यों न आप भी अपने टेस्ट लिखवा लें, आपको भी कभी-कभी कुछ तकलीफ रहती है।” मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है, लिखवा लूँगा।”

पर शायद बजट और समयाभाव मेरे नियंत्रण से बाहर जा चुके थे। अब मुझे समझ आता है कि पिता और घर के मुखिया की जिम्मेदारी क्या होती है।

नई पीढ़ी का दृष्टिकोण

आजकल बच्चों की इच्छाएँ और आकांक्षाएँ इतनी अधिक हैं कि उन्हें लगता है — उनकी जरूरतें ही सर्वोपरि हैं, क्योंकि धन जुटाने की जिम्मेदारी पिता की है, चाहे वह कितना भी थक जाए या पिस जाए।

नई पीढ़ी के बच्चों को अपने ऊँचे कद और स्मार्टनेस का गुमान है। मेरा मानना है कि यह गुमान तब टूटेगा जब वे स्वयं अपने बल पर समाज में अपनी जगह बनाएंगे। तब शायद वे समझ पाएँगे कि पिता से मिली सुविधाओं का उपयोग किया या दुरुपयोग।

स्वयं से दूरी

इतना मंथन करने के बाद भी प्रश्न वहीं रह जाता है — मैं स्वयं से मिलने चला था, पर जिम्मेदारियों की  भीड़ में फिर भटक गया। गृहस्थी स्वयं से मिलने नहीं देती। मेरा स्वयं से मिलने का सपना कब पूरा होगा, यह नहीं जानता।

पिता जी का वह “अंकुश” याद आता है, जिसकी ताकत से उन्होंने अपना अस्तित्व कायम रखा — रौब के साथ। शायद मेरी भूल यही थी कि मैंने वह अंकुश उनसे ग्रहण नहीं किया। इसीलिए आज मैं अपने ही वजूद को स्वयं के भीतर चाहकर भी नहीं ढूंढ पा रहा हूं।

समय की सीख

अंकुश के बिना विशालकाय हाथी भी निरंकुश हो जाता है, फिर मनुष्य की क्या हैसियत! स्वयं से मिल पाना आज मेरे लिए संभव नहीं। पर मुझे विश्वास है — समय बड़ा बलवान है, आज नहीं तो कल, वह मुझे मेरे “स्वयं” से अवश्य मिलवा देगा। काल की भित्ति में सकल संसार है।”

(लेखक सौरभ पाण्डेय दिल्ली पुलिस में दो दशको से अधिक समय से कार्यरत हैंl प्रकृति से प्रेम करते हैं एवं मानवतावादी दृष्टिकोण रखते हैं। समाज को एक अलग नजरिए से देखते व चिंतन करते हैंl)