कास के फूलों के बहाने बचपन और अपने शहर बस्ती से जुड़ाव की कहानी

कास के सफेद फूल केवल शरद ऋतु के आगमन का संकेत नहीं, बल्कि बचपन की स्मृतियों, साहित्यिक संवेदनाओं और अपनी मिट्टी से जुड़े आत्मीय रिश्तों के भी प्रतीक हैं। बनारस से अयोध्या की रेल यात्रा के दौरान कास के फूलों से हुआ सामना लेखक आनन्द त्रिपाठी को स्मृतियों, सिनेमा, साहित्य और अपने शहर बस्ती की […]

कास के सफेद फूल केवल शरद ऋतु के आगमन का संकेत नहीं, बल्कि बचपन की स्मृतियों, साहित्यिक संवेदनाओं और अपनी मिट्टी से जुड़े आत्मीय रिश्तों के भी प्रतीक हैं। बनारस से अयोध्या की रेल यात्रा के दौरान कास के फूलों से हुआ सामना लेखक आनन्द त्रिपाठी को स्मृतियों, सिनेमा, साहित्य और अपने शहर बस्ती की भावनात्मक दुनिया में ले जाता है। प्रकृति के सहज सौंदर्य से शुरू हुआ यह सफर जीवन के उन अनमोल संबंधों को भी छूता है, जो समय और दूरी के बावजूद मन में सदैव जीवित रहते हैं।

बनारस से अयोध्या जाने वाली ट्रेन अपने गंतव्य की ओर सरपट दौड़ी चली जा रही थी। विंडो सीट पर बैठे होने का संयोग होने के चलते आँखें खिड़की के बाहर खेतों में धान की हरितिमा को अपलक निहार रही थीं। अचानक नज़र कास के झुरमुटों पर पड़ी और उसके सफेद फूलों को देखकर थम सी गई। कास के इन सफेद फूलों को देखकर मन स्मृतियों के बियाबान में भटकने लगा।

कास के फूलों की पहली धुँधली स्मृति, जो मेरे मानस पटल पर अंकित है, वह उस समय की है, जब बचपन में अपने पैतृक गाँव अछती की ओर साइकिल या रिक्शा की सवारी से कुआनो नदी के किनारे बने मिट्टी के बाँध के रास्ते से होकर जाना होता था। बाँध के दोनों किनारों पर सरपत के झुरमुटों के साथ कास के सफेद फूल भी दिखाई देते थे, जिन्हें देखने और छूने की बालसुलभ उत्सुकता के चलते इनके प्रति एक सहज आकर्षण बालमन में हुआ करता था।

ट्रेन की खिड़की से आँखों की कास के फूलों के साथ लुका छिपी जारी थी, लेकिन मन इन फूलों पर अटक सा ही गया। कास के फूलों को लेकर स्मृतियों की आवाजाही का सिलसिला जारी था, जिससे गुजरते हुए महान फिल्मकार सत्यजीत रे द्वारा निर्देशित पहली फिल्म पाथेर पांचाली (1955) के उस क्लासिक दृश्य की याद आना नितांत स्वाभाविक ही था, जिसमें रेलगाड़ी के इंजन की सीटी की आवाज सुनकर अपू और दुर्गा रेलगाड़ी को देखने की उत्सुकता में सफेद कास के फूलों से भरे विशाल मैदान के बीच बालसुलभ चपलता के साथ दौड़ते हैं।

यह सीन भारतीय सिने इतिहास के सबसे आइकॉनिक दृश्यों में से एक है, जिसे विजुअल पोएट्री के विशेषण से भी नवाजा गया है। कास के सफेद फूलों से भरे इन मैदानों को सत्यजीत रे ने सी ऑफ फ्लफी व्हाइटनेस की संज्ञा दी थी।

जब कास के फूलों और पाथेर पांचाली पर बात चल ही निकली है, तो बंगाल और वहाँ की विशिष्ट दुर्गा पूजा का जिक्र किए बिना बात अधूरी ही रह जाएगी। बंगाल में कास के फूलों के खिलने को इस बात का प्रथम संकेत माना जाता है कि माँ दुर्गा अपने मायके धरती पर आ रही हैं और पूजा आने वाली है। नीले आसमान के नीचे मंद मंद बहती हवाओं के साथ अठखेलियाँ करते हुए कास के फूल देवी दुर्गा के स्वागत की बाट जोहते सरीखे प्रतीत होते हैं।

कास के फूलों का बंगाल की दुर्गा पूजा में बेहद रचनात्मक उपयोग भी किया जाता है। ढाकियों के ढोल की सजावट कास के फूलों के बिना अधूरी ही है।

कास के फूलों की स्मृतियों की आवाजाही से विराम लेकर अब मन में कास और उसके फूलों की प्रकृति को जानने की इच्छा बलवती हो चली थी। हाथों की उँगलियाँ मोबाइल के कीपैड पर थीं और गूगल बाबा के सहारे सूचनाएँ स्क्रीन पर। जो देखा पढ़ा, उसका सार यही कि दरअसल कास एक प्रकार की जंगली घास है। इसका वैज्ञानिक नाम Saccharum spontaneum है, जिसके फूल सफेद और रुई के फाहों से भी ज्यादा नरम होते हैं।

कास के सफेद फूल एक क्लाइमेट इंडिकेटर की तरह हैं, जो मानसून की विदाई तथा शरद ऋतु के आगमन की सूचना देते हैं।

साहित्य का विद्यार्थी होने के चलते हर चीज को साहित्य के नजरिए से भी देखने समझने का संस्कार अब स्वभावगत हो चला है। कुछ खोजबीन की, तो पाया कि महाकवि कालिदास ने अपनी प्रथम काव्य रचना ऋतु संहार में शरद ऋतु के आगमन का उल्लेख करते हुए कास के फूल को नववधू के परिधान के रूप में वर्णित किया है।

महाकवि लिखते हैं कि शरद ऋतु का पदार्पण रमणीय नववधू के समान होता है। पके हुए धान से सुंदर एवं झुकी बालियाँ तथा खिले हुए कमलों के मुख वाली शरद ऋतु कास पुष्प का उज्ज्वल वस्त्र धारण किए हुए मतवाले हंसों के कलरवों का नूपुर पहने हुए अवतरित होती है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के किष्किंधा कांड में कास के विषय में बहुत सुंदर चौपाई रची है।

बरसा विगत सरद रितु आई
लछमन देखहु परम सुहाई
फूले कास सकल मही छाई
जनु बरसा कृत प्रकट बुढ़ाई

भावार्थ में भगवान राम लक्ष्मण को शरद ऋतु के आगमन का वर्णन करते हुए कहते हैं कि हे लक्ष्मण, देखो वर्षा ऋतु बीत गई है और अत्यंत सुंदर शरद ऋतु आ गई है। चारों तरफ कास के सफेद फूल पूरी पृथ्वी पर ऐसे छा गए हैं, मानो वर्षा ऋतु ने बूढ़े होकर अपने सफेद बालों के रूप में अपना बुढ़ापा प्रकट कर दिया हो।

महाकवि कालिदास और बाबा तुलसीदास की रचनाओं में कास के फूलों का यह वर्णन दिखाता है कि इसका सहज सौंदर्य रचनाकारों को भी अपने आकर्षण में बाँधता है। इसलिए अन्य रचनाकारों ने भी कास के फूल को लेकर बहुत सुंदर बिंब रचे हैं।

उदाहरण के लिए, रचनाकार नीलकमल अपने आलेख कविता को कास के फूल जैसा होना चाहिए में लिखते हैं कि धरती की छाती में दूध उतरता है, तो कास के फूल खिलते हैं। धानी चूनर दूध के फेन से भीग उठती है। कास के फूल धान के खेतों के बीच ऐसे दिखते हैं, मानो हरी धरती की माँग किसी ने सफेद फूलों से भर दी हो। पितृपक्ष में पितरों के स्मरण के साक्षी बनते हैं ये कास फूल और महालया के बाद देवी दुर्गा के आगमन के लिए मचल उठते हैं।

ये फूल किसी बुजुर्ग की तरह खेतों के बीच खड़े अपने घर परिवार के सकुशल लौट आने के लिए प्रार्थना करते हैं। घरों को लौटते अपने लोगों को देखकर ये कास के फूल जैसे हाथ हिला रहे हों।

कविता को कास जैसा होना चाहिए। वह समय के बदलने की गवाही में हरदम खड़ी हो। निर्लिप्त सी, लेकिन निडर।

कास के फूलों के इन सौंदर्यात्मक बिंबों के साथ गुजरते हुए ट्रेन अयोध्या धाम स्टेशन पर कब आ पहुँची, इसका कुछ भान ही नहीं रहा। अपने आराध्य श्रीराम और अयोध्या धाम की पवित्र भूमि को सादर नमन करते हुए अपने गृह जनपद की ओर निकलना हुआ।

कुआनो नदी पार कर जब अपने शहर बस्ती में प्रवेश कर रहा था, तो प्रसिद्ध कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की चर्चित कविता कुआनो नदी की याद अनायास आती रही। पहले पढ़ाई और अब नौकरी के चलते अपना बस्ती शहर छूट सा गया है।

प्रसिद्ध शायर निदा फ़ाज़ली के शब्दों में अपने मन की बात बयाँ करूँ, तो कुछ यूँ कि

घर को खोजें रात दिन, घर से निकले पाँव
वो रस्ता ही खो गया, जिस रस्ते था गाँव

लेकिन जब भी पाँव अपने शहर की जमीं पर पड़ते हैं, तो एक अजीब किस्म की भावुकता घेरने लगती है। जान रहा हूँ कि विषयांतर हो रहा है। बात कहाँ कास के फूलों से शुरू हुई थी और पहुँच चली कुआनो नदी और बस्ती शहर तक।

लेकिन यह भटकाव भी जीवन जीने की प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है, तो इसे सहज भाव से स्वीकारते हुए कास के फूलों के साथ ही अपनी बात का अंत समकालीन वरिष्ठ कवि ध्रुव गुप्त की रची इस कविता के साथ।

कास के फूल

खिलने लगे हैं गाँव के
कच्चे रास्तों के आसपास
कास के शुभ्र श्वेत फूल
पावस के अवसान
और शरद ऋतु के आगमन की
शंखध्वनि करते हुए
शरद पूर्णिमा की रात जैसे उजले
हवा के साथ कुलाँचे भरते
मृगछौनों से मासूम
और रुई के फाहों से कोमल
इन फूलों को दूर से देखो
तो एक अनिर्वचनीय शांति उतर जाए
मन के कोने कोने में

कास के फूल प्रकृति के सौंदर्य, साहित्य की संवेदना और अपनी मिट्टी से जुड़े रिश्तों की याद दिलाते हैं।

लेखक परिचय : आनन्द त्रिपाठी ने प्राथमिक से लेकर स्नातक तक की शिक्षा अपने गृह जनपद बस्ती से प्राप्त की। इसके पश्चात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से एमए एवं एमफिल की उपाधियाँ अर्जित कीं। वर्तमान में उत्तर प्रदेश के राज्य वस्तु एवं सेवा कर (स्टेट जीएसटी) विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर वाराणसी में कार्यरत हैं।